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ज्ञान एवं चिंतन

जीवन को समझने और स्वयं को जानने की यात्रा

ज्ञान केवल जानकारी का संग्रह नहीं है। वास्तविक ज्ञान वह है जो मनुष्य को स्वयं को समझने, अपने जीवन को देखने और अपने कर्मों को अधिक सजगता से जीने की दिशा देता है।

चिंतन हमें प्रश्न पूछना सिखाता है—मैं कौन हूँ? मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? मैं अपने भीतर और अपने आसपास क्या परिवर्तन ला सकता हूँ?

ज्ञान से सेवा तक

जब ज्ञान केवल स्वयं तक सीमित नहीं रहता और उससे दूसरों के जीवन में सकारात्मक योगदान देने की प्रेरणा उत्पन्न होती है, तब ज्ञान सेवा का रूप लेने लगता है।

आत्म-ज्ञान, योग, साधना, करुणा, सकारात्मक चिंतन और सेवा— ये सभी जीवन को अधिक जागरूक और संतुलित बनाने की यात्रा के अलग-अलग आयाम हो सकते हैं।

एक प्रश्न से शुरुआत

कभी-कभी जीवन में परिवर्तन किसी बड़े उत्तर से नहीं, बल्कि एक छोटे से प्रश्न से शुरू होता है।

मैं वास्तव में कौन हूँ?

इस प्रश्न को ईमानदारी से देखना ही स्व-ज्ञान की यात्रा की शुरुआत हो सकता है।

यह कृति समर्पित है

मूल रचना

यह कृति समर्पित उन सबको, जिनके भी हृदय में सेवा भाव रहा।
सेवा की गंगा बहाते रहे, ऐसा पावन प्रयास रहा।
जो भी सेवक थे,सेवक हैं, और सेवा का विस्तार किया।
पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण, उन पावन स्थल को, जहां भी उनका वास रहा।
यह कृति समर्पित उन सबको जिनके भी हृदय में सेवा भाव रहा।।1।।

यह समर्पण उन गुरुओं को (पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी व योगी बाल किशन जी), जिनने मुझ पर उपकार किया। जिनकी कृपा वह शक्तिपात से,मुझ में ध्यान बीज आगाज हुआ।
जिसने ऐसे बदला घटना-घटकों को, कि मुझे आत्मस्वरुप का ज्ञान हुआ। उन ऐसे योगी-सिद्ध व संयासी को, लक्ष्य जन का युग निर्माण रहा।
यह कृति समर्पित उन सबको, जिनके भी हृदय में सेवा भाव् रहा।।2।।

मैं आभारी उन अपनों (माताजी-श्रीमती कुसुम देवी व पिताजी-श्री भूपाल सिंह) का,जिन्हें था मै नन्हा नादान मिला।
उनके लालन-पालन का है यह बल, हृदय में सदगुण सम्मान रहा।
मैं आभारी उन संगी साथी (पत्नी- लक्ष्मी जी) सहपाठी का,जिनका प्रेम अपार मिला।
पत्रिका पुस्तक पत्रों का लेखन साधक, जिन का सहयोग उपकार रहा।
यह कृति समर्पित उन सबको, जिनके भी हृदय में सेवा भाव् रहा।।3।।

यह समर्पण आचार्य ओम ऋषि को, जिनका सदा आशीर्वाद रहा।
ऐसे प्रेरक हर सेवक को, जिनके जीवन का सेवा-श्रम श्रृंगार रहा।
उस 21 जून के योग दिवस को, जब योगमय सारा जहान रहा।
योगऋषि के उस योगमंत्र को, जिससे विश्व हमें पहचान रहा। यह कृति समर्पित उन सबको, जिनके भी हृदय में सेवा भाव रहा।।4।।

(हर व्यक्ति के निर्माण में पूरे समाज का प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष योगदान होता है अतः-)

मैं कृति हूँ आप सब के द्वारा कृत, मैं तो बस निर्माण रहा।
मैं निर्माण हूँ आप सबका फिर,यह (कृति) मेरा कैसे निर्माण रहा।
तो यह कृति है,आप सब के द्वारा ही कृत,ऐसा मेरा विश्वास रहा।
यह कृति समर्पित तुम सबको, क्योंकि यह सब तुम्हारा ही निर्माण रहा।
यह कृति समर्पित उन सबको जिनके भी हृदय में सेवा भाव रहा।।5।।

जो सबमें है(ब्रह्म-जो हर कण में है) सो मैं भी हूँ(सोअह्म्- ब्रम्ह स्वरुप आत्मा), पढ़कर (यह कृति) जिसका ऐसा निश्चल भाव् रहा।
परमार्थ (परसेवा) को ही स्वार्थ (स्वसेवा) मानेगा, ऐसा मेरा विश्वास रहा।
यह कृति समर्पित उन सबको जिनके भी हृदय में सेवा भाव रहा।।6।।

{ॐ श्रीराम}

यह रचना मूल रूप में प्रस्तुत की गई है। इसके शब्दों और भाव में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है।

ज्ञान, साधना और सेवा

ज्ञान को जीवन में उतारने के लिए केवल पढ़ना पर्याप्त नहीं है। उसके साथ आत्मचिंतन, अभ्यास, साधना और व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

इसी दृष्टि से Yogis Sena का प्रयास आत्म-ज्ञान, योग एवं साधना, सकारात्मक चिंतन और सेवा की भावना को जीवन से जोड़ने का है।

कुछ प्रश्न अपने लिए

  • मैं अपने जीवन में किन मूल्यों को सबसे अधिक महत्व देता हूँ?
  • मेरे विचार मेरे व्यवहार को किस प्रकार प्रभावित करते हैं?
  • मैं अपने ज्ञान का उपयोग अपने और समाज के जीवन में सकारात्मक योगदान के लिए कैसे कर सकता हूँ?
  • क्या मैं प्रतिदिन कुछ समय आत्मचिंतन और साधना के लिए निकाल सकता हूँ?

ज्ञान से आत्मचिंतन, आत्मचिंतन से साधना और साधना से सेवा

जीवन की यात्रा में हर व्यक्ति अपने अनुभवों से सीखता है। उद्देश्य किसी एक विचार को थोपना नहीं, बल्कि व्यक्ति को स्वयं विचार करने, समझने और अपने विवेक से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना है।

डर नहीं — दिशा।

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आत्म-ज्ञान, योग, साधना और सेवा की इस यात्रा में आपका स्वागत है।

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आध्यात्मिक अनुभव व्यक्ति-विशेष के अनुभव हो सकते हैं। उन्हें सार्वभौमिक वैज्ञानिक प्रमाण या किसी निश्चित परिणाम की गारंटी के रूप में नहीं समझना चाहिए।