Need Of Swarth Yoga

3
607

योग विद्या पर अनेकानेक शास्त्रों की रचना काल के बदलाव के साथ की जाती रही है, जिससे योग विद्या का अधिकाधिक उपयोग आम लोगों को मिल सके।समय के बदलाव पर नजर रखते हुए स्वयं के अनुभवों को आम जन के समक्ष रखने की प्रबल चेष्टा इसलिए हुई क्योंकि वर्तमान समय में पुस्तक लेखनादि में इधर उधर से कुछ पाठ्य सामग्री का संग्रह कर एक पोथी तैयार कर दी जाती है।जोकि, साधक का मार्गदर्शन करने की बजाए उसे अनजान दिशा में ले जाती है, जबकि इस विषय पर हमारा मानना यह है कि मंजिल पर पहुंचने के लिए केवल मेहनत और लगन से चलना ही पर्याप्त नहीं होता बल्कि सही दिशा में अपेक्षाकृत कम मेहनत व् लगन से चलना ज्यादा संतोषप्रद व परिणामदायी होता है।गलत दिशा में मेहनत और लगन लक्ष्य से जल्दी ही और अधिक दूर ले जाती है।अब तक योग की इतनी परिभाषाएं गढ़ी जा चुकी हैं, कि साधक जिंहें साधक तत्व समझते हैं, वास्तव में उनके साधना मार्ग में वही सबसे बड़ी बाधा साबित हो रही हैं। साथ ही उनका विस्तार इतना है, कि प्रारंभिक साधक भ्रमित हो जाते हैं, वह लक्ष्य निर्धारित नहीं कर पाते।


    महर्षि पतंजलि द्वारा योग दर्शन वर्णित योग साधन में लगे योग साधकों के चित्त में विक्षेप करने वाले नौ अवयवों को जानना अति आवश्यक है।

    व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रांतिदर्शनालब्धभूमिकत्व अनावस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्ते अंतराया:।।योगदर्शन/समाधिपाद ।।30।।

    अर्थ:- व्याधि,स्त्यान,संशय,प्रमाद,आलस्य,अविरति,भ्रांतिदर्शन,आलब्धभूमिकत्व अनावस्थितत्व यह नौ चित्त के विक्षेप या अंतराय हैं। यही योग साधक को साधन से विचलित करने वाले यह “नौ” योग मार्ग के विध्न माने गए हैं।
    1.) व्याधि:-शरीर, इंद्रिय समुदाय और चित्त में किसी प्रकार का रोग उत्पन्न हो जाना व्याधि है।
    2.) स्तयान:- अकर्मण्यता अर्थात साधना में प्रवृत्ति ना होने का स्वभाव है।
    3.)संशय:- अपनी शक्ति में या योग के फल में संदेह हो जाने का नाम संशय है। 
    4.)प्रमाद:-योग साधनों के अनुष्ठान की अवहेलना बेपरवाही करते रहना प्रमाद है।
    5.)आलस्य:-तमोगुण की अधिकता से चित्त और शरीर में भारीपन हो जाना और उसके कारण साधन में प्रवृत्ति ने होना आलस्य है।
    6.)अविरति:- विषयों से इंद्रियों का संयोग होने से उनमें आसक्ति हो जाने के कारण चित्त में वैराग्य का अभाव हो जाता है तो उसे अविरति कहते हैं। 7.)भ्रान्तिदर्शन:-योग के साधनॉ को किसी कारण से विपरीत समझना अर्थात यह साधन ठीक नहीं है ऐसा मिथ्या ज्ञान हो जाना भ्रान्तिदर्शन है।
    8.)अनालब्ध भूमिकत्व:-साधन करने पर भी योग की भूमिकाओ का अर्थात साधन की स्थिति का प्राप्त न होना अनालब्ध भूमिकत्व है इससे साधक का उत्साह कम हो जाता है।
    9.)अनवस्थितत्व:- योग साधन से किसी भूमि में चित्त की स्थिति होने पर भी उसका न ठहरना अनवस्थितत्व है।इस प्रकार इन चित्त विक्षेपों को ही अंतराय और योग के प्रतिपक्षी आदि नामों से कहा जाता है। परंतु निष्ठापूर्वक ध्यान अभ्यास इन सभी बाधाओं व अन्य सभी समस्याओं का समाधान है।क्योंकि, जब भी हम किसी समस्या में होते हैं सबसे पहले हमारे मन में समस्या से संबंधित प्रश्न उठता है तथा वह समस्या हमारी नजर में जितनी बड़ी होती है हमारा मन भी उतनी ही अधिक प्रगाढ़ता व समय तक समस्या के समाधान का ध्यान करता है।अतः ध्यान करना हम सबका स्वभाव है और अंततः हमें अपने भीतर से ही समस्या का समाधान मिल जाता है। इस ध्यान में समझरुपी एक बहुत ही बारीक रेखा होती है। कि, हम समस्या का ध्यान करते हैं या समाधान का ध्यान करते हैं।समस्या नकारात्मक तत्व है अतः इसका ध्यान हमारे अंदर नकारात्मक ऊर्जा की वृद्धि करता है और समाधान समस्या का सकारात्मक पक्ष है। जिसका ध्यान हमारे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। इस प्रकार समस्या के ध्यान का परिणाम निराशा, चिंता, व दुःख है,तो समाधान के ध्यान का परिणाम आशा की किरण भयमुक्ति, उत्साह व सुख है। अतः हमें अपने मन की गति व कार्यों का अवलोकन करना आना चाहिए।गिरना,नष्ट होना,आलस्य, प्रमाद, निकृष्टता आदि दुर्गुणों के फलीभूत होने के लिए हमें किसी प्रयास की आवश्यकता नहीं होती। जबकि उठना, सृजन करना, सक्रिय करना, होने के लिए सदैव् प्रयास की आवश्यकता होती है। इसी प्राकृतिक नियम के कारण हमारा मन भी साधना के ज्ञान के अभाव में समस्या के ध्यान को अधिक समय देता है। जबकि समाधान के ध्यान के लिए मन को देखना जानना समझना अनिवार्य है। इसके लिए तत्व अभ्यास करना पड़ता है व प्रयत्न पूर्वक मन के कार्य व दिशा को समझना अनिवार्य है इस प्रकार आत्मविश्लेषण की क्षमता का लगातार विस्तार करना ही साधना है और योग का सर्वोत्तम साधन है अब प्रश्न उठता है कि हमारी ध्यान विधि क्या हो? ध्यान विधि के विषय में महर्षि पतंजलि कहते हैं।
         यथाभिमत ध्यानाद्वा।।
    (39 / 1 समाधिपाद- योग दर्शन )
        
    अर्थात जिसको जो अभिमत (मान्य) हो उस ध्यान से भी मन स्थिर हो जाता है अर्थात ध्यान विधि थोपी नहीं जा सकती है। साधक की रुचि अनुरुप होनी चाहिए। हम सभी के जीवन में सबसे प्यारा हमारा स्वार्थ होता है और हम अपने स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक प्रयास करते हैं स्वार्थ योग इसी क्रम में आपके स्वार्थ को पूरा करने के साथ-साथ आत्मोत्थान व आत्मज्ञान का मार्ग प्रशस्त करता है। परमात्मा सत चित आनंद स्वरुप है उसे महसूस करने के लिए सुखी होना अनिवार्य शर्त है दुःख में मनुष्य कभी परमात्मा के परम सुख को नहीं जान सकता क्योंकि कष्ट में मनुष्य मंदिर मस्जिद गिरजाघर जहां भी जाएगा उसके चित्त की प्रथम प्यास उसके कष्ट निवारण की होगी न की परमात्मा को जानने की, क्योंकि उसके जीवन की गति उसकी प्यास पर उसकी इच्छा पर निर्भर है। उसके मुख से मंत्र उच्चार नमाज या बाइबल के सूत्र भले ही उच्चारित होते सुनाई पड़े परंतु उसकी सच्ची प्यास तो अपने कष्ट निवारण की ही है उस समय उसका कोई प्रयोजन नहीं हो सकता है ईश्वर को जानने समझने में। कष्ट के कारण उसका मन ईश्वर में ठीक उसी प्रकार नहीं ठहर सकता मानो किसी को अत्यंत भूख लगी हो या शरीर पर कपड़े न होने के कारण ताप से पीड़ित हो या किसी व्याधि से ग्रस्त हो और उसे कहा जाए तुम परमात्मा का ध्यान करो समाधिस्थ हो जाओ। यह उस परिस्थिति में उसके मतलब की बात नहीं है परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं कहना चाहता हूं कि उसके जीवन में कभी ध्यान का समाधी का फूल नहीं खिल सकता है यह हम सबकी, समाज की, सरकारों की जिम्मेदारी है कि उसे उस कष्ट के स्थिति से निकाला जाए व सुख की स्थिति तक पहुंचाया जाए कि उसमें भी ध्यान बीज का आगाज हो सके यहां कष्ट और दुख में भेद समझ लेना महत्वपूर्ण है। कष्ट शारीरिक स्तर की घटना है भूख प्यास गर्मी सर्दी व्याधि आदि हैं, जबकि दुख मानसिक स्तर की घटना है दुख का मूल इंद्रिय सुखों की अति आकांक्षा है
    साथ ही साधारण मानव के लिए योग ध्यान की उच्च स्तरीय साधना की बातें इस प्रकार की होती हैं माना कक्षा प्रथम के विद्यार्थी को पढ़ाने के लिए पीएचडी शिक्षक नियुक्त कर दिया गया हो।इस प्रकार दोनों पक्षों के मानसिक स्तर का बड़ा अंतराल व कष्ट पूर्ण जीवन आम जन की योग साधना के प्रति उदासीनता का वृहद कारण रहा है स्वार्थ योग इन मानसिक स्तरों के बीच की बड़ी खाई को पाटने की व कष्ट निवारण की सर्वोत्तम विधि है। साथियों स्वार्थ योग सभी प्रकार की मानसिक शारीरिक दक्षता व सभी प्रकार के रोगी, योग साधकों व् आधुनिक समय की भौतिक सुख सुविधाओं की आवश्यकता व व्यस्तता के अनुरूप तैयार किया गया है। योग के लक्ष्य ध्यान समाधि व आत्मसाक्षात्कार के निकटतम अधिकतम साधकों को सहज ही पहुंचाया जा सके व इस बात का पूर्ण अनिवार्यता के साथ ध्यान रखा गया है कि अति रचनात्मकता के चक्कर में योग विद्या की कोई सैद्धांतिक हानि न हो जैसा की आजकल अधिकतर रचनाओं में आसानी से देखने को मिल जाता है इस प्रकार यह स्वार्थ योग सभी स्तर के लोगों के सभी प्रकार के शारीरिक मानसिक आध्यात्मिक भौतिक सामाजिक स्वार्थ पूरा करने की योग्यता के साथ ही (स्व)आत्मा +अर्थ(बोध) अर्थात स्वार्थ= स्व का अर्थ=आत्मबोध कराने में सक्षम है। 

     To join yogis sena as administrator(पदाधिकारी) or volunteer(कार्यकर्त्ता)

    Please click

    ?JOIN YOGIS⛳SENA?

    डॉ संजीव कुमार(योगी जी)

    CYBER SAINIK PLZ SHARE FOR 🇮🇳🕉️⛳️
    SHARE

    3 COMMENTS

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here