स्व-ज्ञान जीवन है!स्व-विस्मरण मृत्यु!

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योग गुरु डॉ0 संजीव कुमार के साधना अनुभव(स्वयं के शब्दों में)

{शून्य से आत्मसाक्षात्कार की आध्यात्मिक यात्रा}

सार :- स्व-ज्ञान ही जीवन है व स्व-विस्मरण मृत्यु! अतः हमें स्वयं को पूर्ण रुप से जानकर जीवन को पूर्ण रूप से जीने का पूर्ण प्रयास करना चाहिए ? मुख्यांश:- ओंकार की ध्वनि को सुनकर अपने संपूर्ण प्राणों को हृदय में एकत्रित कर उस पवित्र ध्वनि को सुनते हुए शरीर से बाहर भ्रूमध्य से निकलने का ज्यों ही मैंने संकल्प किया! वैसे ही एक झटके के साथ मैं शरीर से बाहर निकल गया! उस समय ऐसा अनुभव हो रहा था मानो जैसे किसी अंधेरी सुरंग में मैं तेजी के साथ प्रवेश कर रहा हूं साथ ही उस सुरंग के दूसरे सिरे से ब्रह्मनाद की ध्वनि के साथ साथ एक तीव्र प्रकाश भी दिख रहा था। मुझे ऐसा अनुभव हो रहा था जैसे गुरु जी और माता जी दोनों अपने संयुक्त साधना प्रयास से मुझे इस शरीर से बाहर निकलने के अनुभव को,ब्रह्मनाद के अनुभव को, मुझे किसी उच्च स्तरीय प्रयोजन के लिए तैयार करने के लिए वह स्वयं मुझे यह आत्मसाक्षात्कार का अनुभव करा रहे हैं। इस दौरान मैं “आत्म स्वरूप” अपने स्थूल शरीर से एक कंपन युक्त चमकदार तार रूपी किसी चेतन चीज से जुड़ा रहा कुछ समय बाहर रहने के बाद मन में जैसे ही संदेह व् भय पैदा हुआ कि कहीं मैं अपने शरीर से बाहर ही तो नहीं रह जाऊंगा! क्षण भर में पुनः एक झटके के साथ मैं शरीर में प्रविष्ट हो गया और उत्साहित रोमांचित हो उठा कि वास्तव में मैं अजर अमर अविनाशी हूं यह केवल शास्त्र में लिखी बात मात्र नहीं है यह वास्तव में सत्य है मेरे आनंद का ठिकाना नहीं था मानो मैंने अमृत पी लिया हो मैं मरूंगा नहीं! कितनी अच्छी बात है सोचने में! तो सोचो कितनी अच्छी बात लग रही होगी जानने में! इस प्रकार के विचारों का मन में उल्लास देखते ही बनता था।…. विस्तृत जानकारी के लिए नीचे पढ़ें। जन्म से पूर्व घटनाक्रम:-

हनुमान जी मेरे पिताजी (श्री भूपाल सिंह) के इष्ट देवता हैं व हनुमान जी के सिद्ध श्री योगी बाल किशन जी उनके गुरु थे।मेरे जन्म से पूर्व माताजी पिताजी संतान प्राप्ति हेतु आशीर्वाद लेने उनके पास गए थे,फलस्वरूप मै आपके बीच हूँ।(जैसा की पिताजी द्वारा बताया गया)

जन्म के बाद:-

दादाजी अध्यापक थे साथ ही सच्चरित्र उनके जीवन का विशेष अलंकार रहा।उन्हीं की हनुमान चालीसा से बचपन की किस अवस्था मेँ मैंने साधना शुरु की मुझे स्पष्ट ध्यान नहीं परंतु वह निश्चय ही वह उम्र रही होगी जब मैंने पढ़ना सीखा। उससे पहले दादाजी के साथ ही मैं संध्या के समय ध्यान मुद्रा में बैठ जाया करता था, जल्द ही मुझे हनुमान जी का पूरा पाठ याद हो गया।स्कूल में गायत्री मंत्र के जप के साथ प्रार्थना का प्रारंभ होता था। प्रारंभिक शिक्षा कक्षा (एक से सात तक) ग्राम के ही विद्यालय “सरस्वती शिशु मंदिर” में हुई, जोकि आर्य समाज संस्था द्वारा संचालित था। वहाँ के प्रधानाचार्य (श्री महेंद्र सिंह सिरोही) बहुत ही नेक,अनुशासन प्रिय थे व संस्कार शिक्षा पर विशेष जोर रखते थे।अतः गायत्री मंत्र, भोजन मंत्र, वंदे मातरम, राष्ट्रगान व अन्य प्रार्थनाए याद करना पैर छूकर नमस्ते करना आदि अनिवार्य बातें थी।इस प्रकार गायत्री मंत्र विधालय से व हनुमान चालीसा दादा ज़ी के माध्यम से मुझे याद हो गयी इसके बाद तो गायत्री मन्त्र व हनुमान चालीसा का जाप मेरे लिए आनंद की बात होने लगा।जब भी अकेलापन मिलता यही दोनों बचपन से मेरे अकेलेपन के साथी थे।(अब ध्यान है) समय-समय पर सुबह शाम की प्रार्थना के अलावा भी गायत्री मंत्र व हनुमान चालीसा का जाप हो जाया करता था।परंतु इस में भी नियमितता व अनियमितता का क्रम कुछ इस प्रकार चला कि दो-तीन महीने नियमित साधना,फिर दो-तीन महीने अनियमित,फिर 3 महीने नियमित 2 महीने से अनियमित, इसी क्रम में 4 महीने नियमित 2 महीने अनियमित, 5 महीने नियमित 1 महीने अनियमित, इस प्रकार जब-जब ईश्वर में विश्वास की कमी आती तब-तब साधना में अनियमितता आ जाती थी।समय-समय पर पिताजी गुरुजी (श्री योगी बाल किशन जी) का घर में अक्सर महिमामंडन किया करते थे। समय के साथ-साथ गुरुजी में मुझे असीम श्रद्धा उत्पन्न हुई व मुझ में हनुमान जी की आराधना व ध्यान करने की प्रबल चेष्टा का उदय हुआ।धीरे-धीरे विश्वास प्रगाढ़ होता गया और नियमितता बढ़ती गई।

अन्य संस्मरण:-

मुझे याद आ रहा है,मैं पांचवी कक्षा में था तब मैंने पहली बार अनजाने ही त्राटक क्रिया का अभ्यास प्रारंभ कर दिया था।वह आरंभिक त्राटक लेट कर बल्ब को टकटकी लगाकर देखने के रूप में था। त्राटक क्रिया का अभ्यास उसके से हानि लाभ से अपरिचित अनायास ही मैं किसी भी बिंदु के ऊपर,पुस्तक पर, काफी दिनों से देर तक टकटकी लगाकर देखने के रूप में खेल ही खेल कर रहा था फिर एक दिन मैंने अपनी बड़ी बहन को त्राटक प्रतियोगिता में आमंत्रित कर दिया और कहा देखते हैं, कौन अधिक देर तक बल्ब को बिना पलक झपकाए देखते रह सकता है।मेरा पूर्व का अभ्यास होने के कारण मैं जीत गया। इस घटना ने मुझे इसका अभ्यास करने के लिए और अधिक प्रेरित किया। फिर अनायास ही एक दिन पूजा करते हुए (सन 2002 में) मेरे मन में दीपक की लौ पर त्राटक करने का भाव मुखरित हुआ। इस प्रकार मैंने इतनी दृढ़तापूर्वक त्राटक करना प्रारंभ कर दिया,कि जब तक घी से पूर्ण भरा हुआ दिया स्वयं नहीं बुझ जाता था, तब तक मैं लगातार टकटकी लगाकर दीपक की लौ को देखता रहता था व उसके साथ साथ हनुमान चालीसा व गायत्री मंत्र का जाप भी करता रहता था।उन दिनों मेरी रुचि क्रिकेट खेलने में थी,तो मेरे खेल में अभूतपूर्व सुधार हुआ।इससे भी मुझे और अधिक त्राटक करने की प्रेरणा मिली।उन्हीं दिनों बड़ी बहन की सगाई हुई,जीजा जी योग विज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहे थे शादी से पूर्व ही मैं उनसे मिलने गया तो वह उस समय अपना दैनिक अध्ययन कर रहे थे। उनकी एक पुस्तक को मैंने खोला तो सर्वप्रथम त्राटक वाला पेज खुला। उस दिन मैंने जीवन में त्राटक शब्द पहली बार पढ़ा और यह जानकर कि यह योग की क्रिया है, जो कि मैं अनजाने ही दो-तीन घंटे रोजाना अभ्यास करता हूँ।रोमांचित हो उठा। त्राटक, ध्यान, समाधि तीनों विषय ही एक दूसरे से सम्बंधित हैं व त्राटक ध्यान और समाधि में किस प्रकार साधक हैं। यह जानकर तो मैं और भी अधिक रोमांचित हो उठा क्योंकि यदा कदा जीवन में समाधि के विषय में जब चर्चा सुनता था, तो समाधि शब्द मन में एक प्रचंड प्रश्न के रूप में उठता था। जैसे ही मुझे इस पुस्तक के माध्यम से पता लगा कि त्राटक ध्यान व समाधि योग की शिक्षा का हिस्सा है,तो मैंने निश्चय कर लिया कि मुझे भी योग विज्ञान में ही शिक्षा ग्रहण करनी है।घर लौटने के बाद मेरा त्राटक अभ्यास और भी सतत् हो गया। क्योंकि, अब मुझे विश्वास हो गया था।कि, मैं जो भी कर रहा हूँ वह वास्तव में भी योग की एक दिव्य क्रिया है। धीरे धीरे आध्यात्मिक साहित्य में मेरी रुचि बढ़ने लगी समाचार पत्र पत्रिकाओं में जो भी अध्यात्मिक लेख होते उन्हें पढ़ना मेरी प्राथमिकता होती थी। एक दिन मैंने पढ़ा बिना अमल किए ज्ञान भार के समान होता है।उसके बाद मैंने योगासन, प्राणायाम साधना भी मंत्र जाप के साथ प्रारंभ कर दी।साथ ही गुरुजी की महिमा का पिताजी अक्सर गुणगान किया करते थे, तो उनसे मिलने की प्रबल इच्छा के चलते उनके पास जा पहुंचा। वह गुरु जी से मेरी पहली मुलाकात थी।लोग वहां अपनी समस्याओं (आर्थिक, सामाजिक,पारिवारिक) व मनोकामनाएं लेकर जाते हैं और मेरे प्रथम संवाद के प्रथम बोल थे “गुरु जी मुझे योग करना है”।प्रत्युत्तर में उन्होंने कहा मेहनत करोगे तो अवश्य हो जाएगा।साथ ही उनकी भभूत उन्होंने दी।उसके बाद मन मस्तिष्क में विचारों का सैलाब दौड़ने लगा।हर आध्यात्मिक विषय का विश्लेषण करने की बुद्धि का मानो उदय हो गया था। मैं क्या हूँ? प्रश्न प्रबल होता गया। उन्हीं दिनों पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी के साहित्य के संपर्क में आया। संयोग से सर्वप्रथम उनकी प्रथम पुस्तक “मै कौन हूँ?” का ही अध्ययन किया व पूर्व की सीख “बिना क्रिया ज्ञानम् भारम्” बिना अमल किए ज्ञान भार के समान होता है” के अनुसार उस पर शत-प्रतिशत अमल करने का प्रयास प्रारंभ कर दिया।अनायास ही गायत्री मंत्र के अनवरत जप का संकल्प मन में आया और शुरू भी कर दिया। सोते-जागते,भोजन करते हर समय गायत्री मंत्र का अनवरत जप मन में चलना प्रारंभ हो गया।साथ साथ गुरूजी पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का साहित्य भी उत्सुकता के साथ पढ़ने लगा।इस दौरान एक विशेष घटना बार बार घटी। साधना के अनुभव पहले आते तत्सम्बन्धी पुस्तक बाद में पढ़ता।जो भी मन में प्रश्न उठता किसी भी प्रकार से वह पुस्तक, न्यूज़ पेपर, पत्रिका मेरे समक्ष होती थी और वही पेज खुलता था, जिस पर मेरे प्रश्न का समाधान होता। शुरू में तो मुझे विश्वास नहीं हुआ परंतु जब यह घटना अनगिनत बार घट गई तो एहसास हो गया कि,गुरुदेव इस रूप में मेरा मार्गदर्शन कर रहे हैं।मानो, मै जो कुछ भी साधना में कर रहा था, अपने साहित्य के माध्यम से उसके सही होने की वह पुष्टि कर रहे थे।गुरुसत्ता की इस अप्रत्यक्ष उपलब्धता के कारण साधना में प्रगति अतिशीघ्रता से हो जा रही थी।गुरुदेव द्वारा वर्णित ध्यान विधि में वाह्य त्राटक,मध्य त्राटक, अंत त्राटक के क्रम में त्राटक साधना का विधान है। मैंने त्राटक के पूर्व अभ्यास के कारण ध्यान अंत त्राटक से शुरू किया।अंत त्राटक के स्थान पर दीपक की लौ का ध्यान करना होता है। जोकि, सहजता से लग गया। जैसाकि वर्णित है लौ वाले स्थान पर 1 महीने के अभ्यास से खुजली, बुदबुदाहट, कम्पन आदि महसूस हो सकते हैं। परंतु मैं यह अनुभव मात्र 5 दिन में ही करने लगा उसके बाद बताई गई विधि अनुसार उस लौ को प्रत्येक चक्र पर ले जाने का अभ्यास करने लगा। जिस चक्र पर भी उस ज्योतिस्वरूप का ध्यान मैं कर रहा था वही पर कंपन बुदबुदाहट को महसूस बहुत आसानी से कर पा रहा था।ध्यान व् गायत्री मंत्र का जप व योगनिद्रा का यह विधान अनवरत चल रहा था। जब कभी भी लेटने का समय मिलता तब तब वह पूर्ण समय योगनिद्रा के अभ्यास का होता था।योग निद्रा के अभ्यास के साथ साथ ही गायत्री मंत्र का जाप व ज्योति स्वरूप का चक्रों पर ध्यान लगातार चलता रहता था।साथ ही निरंतर ऐसी प्रबल भावदशा बनी रहती थी, कि गुरु जी माताजी मानों मुझे किसी बड़े कार्य के लिए तैयार करने के लिए मुझसे यह अनुष्ठान करा रहे हैं जिससे मेरा चित्त परम शुद्ध हो रहा है।मैं अजर अमर अविनाशी आत्मा हूं यह चिंतन और विश्वास समय के साथ-साथ प्रगाढ़ होता जा रहा था। यह क्रम लगभग दो- तीन माह रहा होगा।तभी एक दिन मैंने नाद योग के विषय में पढा, उसी रोज रात में बिस्तर पर लेटते ही मन में विचार आया कि क्यों न नाद योग का अभ्यास किया जाए। जैसे ही मैंने अपने दोनों कानों में उंगली डाली आसानी के साथ प्रथम नाद मुझे ॐ के रूप में सुनाई पड़ा जैसा की नाद योग के बिषय में वर्णन मिलता है कि प्रारंभिक अभ्यास में भिन्न-भिन्न नाद जैसे घंटा,घड़ियाल, वीणा, शंख, बांसुरी आदि के नाद(ध्वनि) सुनाई देते हैं परंतु मुझे इनमें से कोई भी नाद नहीं सुनाई दिया बल्कि सीधे सीधे ओंकार की ध्वनि (ब्रह्मनाद) सुनाई पडा। जैसा कि नाद योग में विधान है की आत्मा अपने संपूर्ण स्थूल शरीर के प्राणों को अपने हृदय में एकत्रित कर स्थूल शरीर से ओंकार रुपी ब्रह्मनाद को सुनते हुए बाहर निकल जाता है। वैसा ही उपर्युक्त पूर्व धारणा-अभ्यास “मैं ज्योति स्वरुप आत्मा हूं अजर अमर अविनाशी हूं” के कारण और अत्यधिक योग निद्रा के अभ्यास के कारण उन दिनों मैं अपने शरीर को 2 मिनट में सुला पाता था। यह शरीर को सुलाने की प्रक्रिया का अनुभव ऐसा होता है जैसा कि हम सभी के जीवन में कभी न कभी हमारा कोई हाथ या पैर दबा रहने के कारण सो जाता है। दबा रहने के कारण उस हाथ या पैर में प्राण का संचार ठीक से नहीं हो पाता है। इसी कारण वह अंग सो जाता है या यूं कहें सुन्न हो जाता है। योगनिद्रा व प्राणायाम के अभ्यास से यह प्रक्रिया ऐच्छिक क्रिया के रूप में परिणत होने लगती है और हमारे प्राण का किसी अंग में जाना, न जाना, ले जाना या खींच लेना, एकत्रित कर लेना हमारे संकल्प के आधार पर होने लगता है इस प्रकार यह अभ्यास पहले से ही अभ्यासित था। अतः ओंकार की ध्वनि को सुनकर अपने संपूर्ण प्राणों को हृदय में एकत्रित कर उस पवित्र ध्वनि को सुनते हुए शरीर से बाहर भ्रूमध्य से निकलने का ज्यों ही मैंने संकल्प किया! वैसे ही एक झटके के साथ मैं शरीर से बाहर निकल गया! उस समय ऐसा अनुभव हो रहा था मानो जैसे किसी अंधेरी सुरंग में मैं तेजी के साथ प्रवेश कर रहा हूं साथ ही उस सुरंग के दूसरे सिरे से ब्रह्मनाद की ध्वनि के साथ साथ एक तीव्र प्रकाश भी दिख रहा था। मुझे ऐसा अनुभव हो रहा था जैसे गुरु जी और माता जी दोनों अपने संयुक्त साधना प्रयास से मुझे अपने इस शरीर से बाहर निकलने के अनुभव को,ब्रह्मनाद के अनुभव को, वह मुझे किसी उच्च स्तरीय प्रयोजन के लिए तैयार करने के लिए वह स्वयं मुझे यह आत्मसाक्षात्कार का अनुभव करा रहे हैं। इस दौरान मैं आत्म स्वरूप अपने स्थूल शरीर से एक कंपन युक्त चमकदार तार रूपी किसी चेतन चीज से जुड़ा रहा। कुछ समय बाहर रहने के बाद मन में जैसे ही संदेह व् भय पैदा हुआ कि कहीं मैं अपने शरीर से बाहर ही तो नहीं रह जाऊंगा! क्षण भर में पुनः एक झटके के साथ मैं शरीर में प्रविष्ट हो गया और उत्साहित रोमांचित हो उठा कि वास्तव में मैं अजर अमर अविनाशी हूं ।यह केवल शास्त्र में लिखी बात मात्र नहीं है यह वास्तव में सत्य है। मेरे आनंद का ठिकाना नहीं था। मानो! मैंने अमृत पी लिया हो। मैं मरूंगा नहीं! कितनी अच्छी बात है सोचने में! तो सोचो कितनी अच्छी बात लग रही होगी जानने में! इस प्रकार के विचारों का मन में उल्लास देखते ही बनता था। यह उल्लास यह उत्सव छह-सात दिन रहा। उसके बाद विपरीत चिंतन प्रारंभ हुआ की जब मैं मर नहीं सकता तो मै कितने समय से हूं? कि जब मैं मर नहीं सकता तो मै कितने समय तक रहूंगा? भीतर से एक ही जवाब मिला हमेशा से हूं, हमेशा तक रहूंगा। फिर मन में एक असीम नीरसता का, शांति का उदय हुआ जो कि लगभग एक से डेढ़ साल तक रही। एक से डेढ़ साल में लगभग सभी रोजमर्रा के कार्य करते हुए ऐसा अनुभव रहा जैसे यह 18 महीने 18 मिनट के बराबर रहे। ऐसी समय शून्यता मन पर छाई रही कि मानो बस दिन निकल रहा है और छिप रहा है। मेरा यह अधिकतर समय मौन ही बीता। बोलने का मन ही नहीं करता था। बोलने का विषय यदि योग होता तो कभी-कभार बोल लिया करता था।यह वह समय था (2004-5)जब मै गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय में मैं योग विज्ञान में स्नातकोत्तर शिक्षा ग्रहण कर रहा था। यह शिक्षा ग्रहण करने में भी एक बड़ी दिलचस्प बात यह रही कि मुझे भ्रम हो गया कि यदि शरीर से बाहर निकलने तक का अभ्यास जब मैं घर पर ही कर पा रहा हूं, तो यदि मैं विश्वविद्यालय में प्रवेश पा लूंगा तो वहां पर जो गुरु जी होंगे वह रोजाना मुझे आगे का अभ्यास अर्थात रोजाना शरीर से बाहर निकलने का अभ्यास कराएंगे। यह धारणा मेरे मन में इस प्रकार बनी क्योंकि बचपन में मैंने रामायण सीरियल देखते हुए देखा था कि राम जी और लक्ष्मण जी को उनके गुरु जी उन्हें ध्यान के माध्यम से शरीर से बाहर निकाल कर हिमालय की यात्रा कराते हैं और आत्म साक्षात्कार होने से यह लगने ही लगा कि सारी घटनाएं सच में होती हैं। और इस प्रकार जब मैंने वहां प्रवेश ले लिया और पाया की वहां तो आसन प्राणायाम षट्कर्मों का अभ्यास और अन्य पाठ्यक्रम के अंतर्गत आने वाली गतिविधियां होती हैं तो मुझे काफी निराशा हुई परंतु मैंने पाठ्यक्रम को पूर्ण करने का निर्णय लिया।

उसके बाद से एक योगीचित्त के संकल्प अनुरूप व अब योगीज़⛳सेना के संकल्प के अनुसार सच्चे स्व-ज्ञान ,स्वास्थ्य, आर्थिक उन्नति की अभूतपूर्व योगसाधना विधियों व प्राकृतिक चिकित्सा, एक्यूप्रेशर के द्वारा असंख्य लोगों की सेवा के साथ, योग विशेषज्ञों, आयुष चिकित्सकों की सरकारी नियुक्ति व संवैधानिक उत्थान के लगातार प्रयास किए जा रहे हैं व अन्य सामाजिक सेवा कार्यो के द्वारा लोगों के जीवन को सुखमय बनाने का प्रयास लगातार किया जा रहा है।इस सेवाकाल का मेरा अनुभव कहता है, जैसा कि हम सभी सामान्यतः देखते हैं, कि अधिकतर लोग, जीवन व दूसरे लोगों के बारे में लगभग पूर्ण जानकारियां होने का दावा करते हुए आसानी से मिल जाते हैं परंतु वास्तविकता यह है कि हमें अपने!स्वयं तक के विषय में ,अपनी दिव्य क्षमताओं, संरचना व रचना के बारे में भी सही जानकारी नहीं है।जबकि! स्वयं के लिए तो हमारी उपलब्धता भी हर समय है व स्वयं के विषय में जानना किसी अन्य विषय या व्यक्ति के बारे में जानने से हमेशा ही आसान होता है। तो होना तो यह चाहिए था कि हमें स्वयं के बारे में अधिकतर जानकारी होती। परन्तु ! 6000 वर्ष पुरानी आत्मज्ञान व मोक्ष पर केंद्रित आध्यात्मिक संस्कृति के वारिस होने के बावजूद हमारी स्वयं के बारे में यह अज्ञानता बेहद आश्चर्यजनक है! जबकि होना तो यह चाहिए था कि हमारे घर-घर मे ध्यान व स्व-ज्ञान की उच्चतम अवस्था को प्राप्त योगी यूं ही मिलते।परंतु 6000 वर्षों से हमें आध्यात्म सिखाने वाली हमारी संस्कृति के, “मानव को महामानव बनाने वाले

स्व-ज्ञान के श्रेष्ठ साधन” ढोंगियों के षड्यंत्र जनित आध्यात्मिक प्रदूषण में लुप्त हो गए। और स्वार्थ(स्व+अर्थ=स्व+ज्ञान) शब्द का सच्चा अर्थ लुप्त होकर मनुष्यता-विनाशक आत्मघाती “लालच” के रूप में प्रचलित हो गया। और हम अस्तित्व में कहां से आये हैं ?कितने समय तक हम रहेंगे ? हमारे भीतर क्या-क्या है?क्या-क्या शक्तियां हैं?और हम अंततः कहां चले जाते हैं? फिर वापस आते हैं कि नहीं आते हैं?क्या हमारा इस शरीर के बाद भी कोई अस्तित्व होता है?यदि होता है तो हमारा स्वरुप क्या होता है?जीवन का पूर्ण रस कैसे प्राप्त हो?आदि जीवन को सार्थक करने वाले स्व-ज्ञान के प्रश्न लालच व अहंकारपुष्टि जनित व्यस्तता के समक्ष महत्वहीन होते चले गए व कर्मफल सिद्धांत की उदासीनता ने तो मानव को,स्वजीवन को ही निरर्थक बनाने व पूर्ण जी-जान से पाप कमाने में लगा दिया।जिसका अकाट्य व निश्चित परिणाम दुःख ही होता है।(यह नियम उतना ही सत्य है जितना कि गुरुत्वाकर्षण का नियम)फलतः ज्ञान के इस दौर में भी अधिकांश लोग मन और आत्मा की बात तो दूर, स्वयं के शरीर तक के विषय में भी नहीं जानते हैं कि शरीर को कैसे चलाना है? उसका रखरखाव कैसे करना है? मन और आत्मा की बात तो बहुत आगे की है। इसी अज्ञानता के कारण लोग बीमार होते हैं और कर्मफल सिद्धांत में विश्वास न रखने वाले लालची चिकित्सक उसका लाभ उठाते है। संविधान (सामाजिक नियमों) की अज्ञानता के कारण लोग, कर्मफल सिद्धांत में विश्वास न रखने वाले लालची पुलिस व वकीलों के, आध्यात्मिक अज्ञानता के कारण धर्म के ढोंगी ठेकेदारों के शोषण का शिकार बनते हैं व उनका पोषण करते हैं। सरकारी योजनाओं की जानकारी के प्रति आमजन की बेरूखी व अज्ञानता ही सरकार के भेजे गए 1 रुपये में से 30 पैसे धरातल पर व 70 पैसे भ्रष्ट भेड़ियों की जेबें भरने का कार्य करती हैं। आजादी के 70 साल बाद भी आमजन की दरिद्रता का यह मुख्य कारण है। उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है, कि हम आध्यात्मिक विरासत (योगासन,ध्यान , समाधि, आत्मसाक्षात्कार की साधनाऐं ) उन्नत सरकारी योजनाओं व उन्नति के लिये हमेशा परिवर्तनयोग्य संविधान आदि संपन्नताओं से परिपूर्ण राष्ट्र हैं।परन्तु हम अपनी ही अज्ञानता के कारण आज आध्यात्मिक,आर्थिक,नैतिक व सामाजिक रूप से दरिद्र बने हुए है व अपनी इस अमूल्य संपदा के लाभ से ठीक उसी प्रकार वंचित है ।माना, आपके दादाजी आपके लिए हजारों करोड़ की संपत्ति की वसीयत रख गए हो और उसका पता आपको तब लगे जब आप अपना जीवन दरिद्रता व कष्टों में बिताने के बाद अपनी आखिरी सांसें गिन रहे हों।“ध्यान करने की चेष्टा न करना ,स्वयं को व स्वयं के आध्यात्मिक, मानसिक, शारीरिक, सामाजिक, संवैधानिक व सरकारी संसाधनो को जानने की चेष्टा न करना बिल्कुल वैसा ही है माना, वसीयत में क्या लिखा है जानने की चेष्टा ही न करना और अंत समय मे पछताना।”

अंतोगत्वा अपने इन सेवा व साधना अनुभवों को आपके समक्ष रखने व ?योगीज़⛳सेना? के गठन का उद्देश्य यह है कि अधिकतम लोग अपनी इन अमूल्य वसीयत व सम्पदाओं का लाभ प्राप्त कर सकें व राष्ट्र क्षमतावान होते हुए भी इस फिजूल आध्यात्मिक, आर्थिक, नैतिक व सामाजिक दरिद्रता से मुक्त हो सके। साथ ही यदि एक भी साधक के जीवन में यह साधना अनुभव ध्यान ,समाधि व आत्म साक्षात्कार के फूल खिलाने में किसी भी प्रकार सहायक हो सके तो मैं अपने इस प्रयास को सार्थक समझूंगा। हमने स्वार्थ योग (वीडियो देखें) 👈 के अंतर्गत आने वाली निम्म साधनाओं…1.अहम विसर्जन क्रिया (वीडियो देखें)

👆अपनी गूढ़ व दिव्य शक्तियों को जागृत करने के लिए

2.श्री सृजन साधना (वीडियो देखें)👈 दरिद्रता मिटाने व सम्पन्नता हेतु

3.स्व-ज्ञान साधना आत्म स्वरूप की झलक प्राप्त करने व समझ विकसित करने के लिए

4.सर्वांग साधना स्वस्थ शरीर के लिए …. के रूप में जनमानस के लिए योग साधना विधियों का सृजन किया है जिसमें अपने साधना अनुभवों को जनसामान्य की चेतना में इस प्रकार प्रवाहित करने का प्रयास किया है कि सहज रुप से अधिकतम व्यक्ति अपनी-अपनी चेतना के स्तर के अनुसार शारिरिक, भौतिक, मानसिक, सामाजिक लाभ ग्रहण करते हुए अंततः आध्यात्मिक लाभ व उपलब्धि को प्राप्त हो सके व अपने अमूल्य मानवजीवन के उच्चतम लक्ष्य परमात्मा को प्राप्त कर सकें ।

सार :- स्व-ज्ञान के प्रारंभ होते ही जीवन में प्रवेश है अर्थात स्व ज्ञान जीवन है व स्व-विस्मरण के साथ ही प्रारंभ मृत्यु की शुरुआत! अर्थात जितने प्रतिशत तुम स्वयं को जान पाते हो अपने जीवन का उतने प्रतिशत ही तुम सदुपयोग कर पाते हो। अतः जितने प्रतिशत भाग तुमने जिया ही नहीं वह तुम्हारे जीवन के साथ-2 एक अनजानी मृत्यु के समान ही है इसलिए हमें स्वयं को पूर्ण रुप से जानकर जीवन को पूर्ण रूप से जीने का पूर्ण प्रयास करना चाहिए ? इसीलिए योगीज्⛳सेना मानव को महामानव बनाने वाली इन अभूतपूर्व योग विधियों के प्रचार प्रसार व सभी सरकारी योजनाओं के लाभों को जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए राष्ट्रीय/प्रांतीय/संभागीय-मंडलीय/जिला/तहसील/ब्लॉक/ग्राम स्तरीय कार्यकारिणीयों के द्वारा जरूरतमंदों को शारीरिक व संवैधानिक सहायता के लिये प्रयासरत है व जानकरियों का सोशल मीडिया व विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से प्रचार प्रसार कर अंतिम व्यक्ति तक लाभ पहुंचाने के लिए संकल्पित है। क्योंकि कोई बड़ी संस्था, Ngo भी, कभी भी सरकारी तंत्र के समान सेवायें देने में क्षमतावान नहीं हो सकते परंतु सौभाग्य से इन सरकारी लाभों को जमीन पर उतारने के लिए जनभागीदारी की अर्थात आपकी अनिवार्य आवश्यकता है।तो,आओ ! देश के लिए योगीज् सेना से जुड़कर राष्ट्र को औऱ बेहतर बनाने का सार्थक प्रयास करें। Please click

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7 COMMENTS

  1. You say population is No.1 problem of India. I agree with you 100 percent. Please let me know what is your plan to tackle this problem.

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