About Swarth Yoga

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स्वार्थ (स्वयं का स्वयं से परिचय)

स्वार्थ शब्द (स्व+अर्थ) दो शब्दों की संधि से बना है जिसका अर्थ है स्वयं का मूल्य इस प्रकार स्वार्थ का अर्थ है स्वयं के अर्थ को जानना दूसरे शब्दों में स्वार्थ का अर्थ स्वयम् का भला करने से भी कहा जाता है, अतः स्वयम् का भला करने के लिए स्वयं को जानना आवश्यक है। क्योंकि, जब तक हमें अपनी शक्तियों, प्रतिभाओं, गुणों, अवगुणों का ज्ञान नहीं होता है।तब तक हम स्वयं का उपयोग और भला भी पूर्ण रुप से नहीं कर पाते हैं। अतः स्वयम को जानने के लिए निम्न प्रश्नों के उत्तर जानना आवश्यक है। कि मैं कौन हूँ? क्या हूँ? कैसे बना हूँ? मैं शरीर हूँ? मन हूँ?या आत्मा हूँ?

उपर्युक्त प्रश्नों का उत्तर महर्षि वेदव्यास स्वाध्याय शब्द को परिभाषित करते हुए दे देते हैं। स्वाध्याय शब्द (स्व+अध्ययन) दो शब्दों से मिलकर बना है जिसका अर्थ है, स्वयं का अध्ययन करना अर्थात हम सब जानते हैं कि स्वयम के अध्ययन से ही स्वयं के अर्थ “स्वार्थ” का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। साथ ही यजुर्वेद का श्लोकांश “यथा पिंडे तथा ब्रम्हांडे” हमें समझाता है कि जो कुछ भी ब्रह्मांड में है वही सब हमारे भीतर भी है। यदि हम ब्रह्मांड के तथ्यों का विश्लेषण सांख्य दर्शन के अनुसार करें तो पाएंगे की ब्रह्म के सभी तत्व हमारे अंदर भी विधमान हैं। साधकों के मार्गदर्शन हेतु स्वयं को जानने के लिए सांख्य योग के सभी 25 तत्वों का विश्लेषण सुगमता से बुद्धिगम्य तत्व से, कठिनता से बुद्धिगम्य तत्व के क्रम में आगे के पृष्ठों में किया जाएगा।

महर्षि वेदव्यास जी स्वाध्याय के विषय में कहते हैं:-

स्वाध्याय प्रणवादि पवित्राणां जपो,मोक्षशास्त्र अध्ययनम् वा।।(व्यास भाष्य- 2/1)

अर्थ:- महर्षि वेद व्यास जी स्वाध्याय के विषय में कहते हैं स्वाध्याय ॐ का पवित्र जप करना व मोक्ष दिलाने वाले शास्त्रों का अध्यन करना है। उपर्युक्त सूत्र से यह संकेत मिलता है कि स्वयं को जानने के लिए ॐ का जाप व मोक्ष शास्त्रों का अध्यन करना चाहिए ॐ के जाप में हमारी श्रद्धा हो उसके लिए ॐ के महत्व को जानना आवश्यक है क्योंकि जिस विषय में हमारा ज्ञान जितना अल्प होता है उस विषय के प्रति हमारे मन में उतनी ही ही अरुचि व उदासीनता होती है व जिस विषय की हमें जितनी अधिक जानकारी होती है उसमें उतनी ही अधिक रुचि होती है

ॐ क्या है?

ॐ को प्रणव भी कहते हैं यह ईश्वर का वाचक है। पतंजलि योग दर्शन में भी कहा गया है।

 “तस्य वाचक प्रणव” (पतंजलि योगदर्शन)

ईश्वर के साथ ओंकार का वाच्य-वाचक भाव संबंध नित्य है, इसे अनहद नाद भी कहा जाता है। अनहद अर्थात जिसकी कोई हद न हो,नाद अर्थात ध्वनि, अर्थात एक ऐसी ध्वनि 

https://youtu.be/cDnm6f22mxE

जिसकी कोई सीमा नहीं है की वह कितने समय से है कितने समय तक रहेगी कहाँ तक फैली है किसके द्वारा उत्पन्न है अर्थात हमेशा से है हमेशा तक रहेगी,सर्वत्र विधमान है, स्वयंभू अर्थात स्वयं उत्पन्न है, न कि किसी माध्यम से।साधारणत: हम सभी जानते हैं कि कोई भी ध्वनि दो वस्तुओं के टकराने से ही उत्पन्न होती है लेकिन यह एक मात्र विशेष ध्वनि है जोकि स्वयं उत्पन्न है इसका कोई स्रोत नहीं है।

टोनोस्कोप का आविष्कार करने वाले डॉक्टर हैंस जैनी 1967 मे टोनोस्कोप नाम के यंत्र पर ॐ का उच्चारण किया तो श्री यंत्र की आकृति उभरकर आने लगी। टोनोस्कोप का प्रयोग ध्वनि तरंगों की तस्वीर देखने के लिए किया जाता है। यह एक रहस्य का विषय है की प्राचीन काल में जब टोनोस्कोप जैसा कोई यंत्र नहीं था लोग ॐ की ध्वनि तरंगों की तस्वीर “श्री यंत्र” को अच्छी तरह से प्रस्तुत करने की क्षमता से युक्त थे। इस बात पर हैंस जैनी आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहते हैं कि पूर्वार्त्त देशों के मनीषि ऋषियों की खोजें अत्यधिक प्रमाणित थी। इससे प्रमाणित होता है कि ॐ वास्तव में संपूर्ण जगत का आधार है क्योंकि “श्रीयंत्र” योग में वर्णित सभी आठ चक्रों की सम्मिलित आकृति है और यह आठ चक्र संपूर्ण जगत के निर्माण के तत्वों “महाभूतों” के संकेत रूप हैं।(इस विषय में बाद में चर्चा करेंगे अन्यथा वर्तमान विषय की दिशा बदल जाएगी) श्री यंत्र की संपूर्ण आकृति पर दृष्टिपात करें तो सबसे मध्य में सबसे कम जटिल व कम पंखुड़ियों वाला चक्र (वृत्त) फिर उससे जटिल व बड़ा, उसके बाद उससे भी जटिल व बड़ा चक्र (वृत्त) होता है।व चक्र (वृत्त) क्रमशः बडा होता जाता है।

https://youtu.be/0Yz3OYijUtI  

साथ ही यदि हम ब्रम्हांड व्यवस्था पर भी दृष्टिपात करें तो सभी ग्रह नक्षत्र आदि चक्राकार (वृत्ताकार) गति कर रहे हैं सबसे छोटा कण इलेक्ट्रॉन भी अनवरत वृत्ताकार गति करता है। जिसकी इसी गति पर पूरा इलेक्ट्रॉनिक्स विज्ञान,अधिकतर आधुनिक तकनीक, व उसके निर्माण आधारित हैं।श्वांस-प्रच्छवांश, शरीर में रक्त का परिभ्रमण ॐ की ही वृत्ताकार ध्वनि तरंगों के कारण लगातार चलता रहता है।कर्मफल चक्र जीवन-मरण-पुनर्जन्म-पुन:मरण,सृष्टि-प्रलय, जल से बर्फ- बर्फ से जल,जल से वाष्प-वाष्प से जल आदि घटनाएं एक चक्र में ही घटित हो रही है।संसार का कोई भी पदार्थ नष्ट नहीं होता बल्कि मात्र रुपांतरित हो रहा है।

उदाहरण:- मोटर गाड़ी में पेट्रोल या डीजल ईंधन के रूप में जलता है तो वह पूर्णतया नष्ट नहीं होता, कुछ का धुआं बन जाता है उससे उत्पन्न ऊर्जा से गति बन जाती है, इस गति से यात्रा होती है और यात्रा से काम बन जाते हैं, कामों से धन उपार्जन होता है। इस प्रकार संसार में नष्ट कुछ भी नहीं होता है, संसार अनवरत परिवर्तनशील है और एक चक्र में रुपांतरित हो रहा है। लाखों वर्ष पूर्व जो पेड़-पौधे जमीन में मलवे में दब गए थे वही कोयला बन गए और अधिक पुराने हीरा बन गए। धातुओं का निर्माण इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, न्यूट्रॉन की संख्या परिवर्तन पर निर्भर करता है और यह संख्या परिवर्तन इलेक्ट्रॉन की गति (ॐ के कारण) ही होता है।

इन्ही इलेक्ट्रॉन-प्रोटॉन-न्यूट्रॉन की संख्याओं के भेद से तत्व लोहा, सोना, हीरा, तांबा आदि भिन्न-भिन्न नामों से जाने जाते हैं।आधुनिक एलोपैथिक दवाएं भी इन्हीं रासायनिक संरचनाओं के आधार पर बनाई जाती हैं।किसी भी तत्व या धातु का कृत्रिम स्वरूप इसी आधार पर तैयार किया जाता है, आज विज्ञान ने इसी आधार पर कृत्रिम सोना, हीरा, दवाएं, हार्मोन व अन्य बहुमूल्य तत्व बनाने में सफलता प्राप्त की है परंतु इलेक्ट्रॉन में गति ॐ क़ी तरगों के कारण है,आधुनिक विज्ञान को यह मानने में कठिनाई होती है।क्योंकि, इसको जानने के लिए ध्यान के गहन अनुभवों की आवश्यकता होती है।ॐ (अ+क्षर) अक्षर है।अर्थात जिसका कभी क्षरण न हो। यह इस बात की पुष्टि कर देता है कि सब कुछ इसी पवित्र ध्वनि के द्वारा सृजित व घटित हो रहा है क्योंकि सृष्टि का कोई भी तत्व नष्ट नहीं होता वरन् एक नए निर्माण के रूप में रूपांतरित हो जाता है अर्थात इलेक्ट्रॉन,प्रोटॉन,न्यूट्रॉन की संख्या में परिवर्तन मात्र हो जाता है व ऊर्जा के रूप में परिणत हो जाता है और सब कुछ एक चक्राकार (वृत्ताकार) क्रम में ॐ की चक्राकार ध्वनि तरंगों से ही चल रहा है।यह माना जाता है संपूर्ण ब्रम्हांड से ॐ की वृत्ताकार तरंगों वाली ध्वनि निसृत हो रही है। हम सबकी हर सांस ॐ की ही ध्वनि से लगातार चलती रहती है, यही सभी प्राणियों की सांस गति को नियंत्रित करता रहता है।ॐ ध्वनि अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली

https://youtu.be/PpQTF_46pks  

है, इसको सुनने के लिए नाद योग साधना की आवश्यकता होती है,साधना की उच्च अवस्था में ही इसे सुना जा सकता है। भौतिक विज्ञान भी मानता है, कि हम एक निश्चित आवृत्ति की ध्वनि को ही सुन सकते हैं उससे कम या अधिक आवृत्ति होने पर हम वह ध्वनि नहीं सुन सकते। परंतु साधना से मन की एकाग्रता बढ़ने पर व चित्त के क्लेश रहित होने पर ही इस ध्वनि को सुना जा सकता है।

उदाहरणत:- संसार में कहीं भी किसी भी ऐसे स्थान पर जाकर देखें जहाँ किसी भी प्रकार की कोई ध्वनि नहीं हो। वह शब्दरोधी कमरा भी हो सकता है या शीशे का कोई बॉक्स परंतु एक ध्वनि अवश्य सुनाई पड़ती है, सन्नाटे की ध्वनि।परंतु, शांति का अर्थ तो आवाज रहित स्थान होना चाहिए। किंतु, वहाँ यह सन्नाटे की आवाज है क्योंकि सृष्टि में चल रहे क्रियाकलापों जैसे-वाहन, मोटर, कल-कारखाने,ध्वनि यंत्र,बोलने की आवाज, ग्रहों के भ्रमण की आवाजें, धरने, नदियां,समुद्र के पानी की आवाज,बादलों की आवाज आदि आपस में मिलकर सन्नाटे की आवाज के रूप में परिणत हो जाती है।नाद योग या नादानुसंधान में साधक इस सन्नाटे की आवाज पर मन को एकाग्र करते हैं एवम् इन मिश्रित आवाजों में ॐ की ध्वनि को पहचानने का अभ्यास करते हैं।जैसा की नाम से ही विदित है नाद का अनुसंधान करना या खोजना।यह ठीक उस खेल की तरह है, जिसमें 10-12 गीत एक साथ बजा दिए जाते हैं और उनमें से एक गाने की पहचान करनी होती है। परंतु ओम की ध्वनि सुनने के लिए अत्यधिक साधना व चित्त को निर्मल करना पड़ता है तभी यह पवित्र ध्वनि साधक को सुनाई पड़ती है। ऊपर्युक्त वर्णन से स्पष्ट है,कि यह अत्यंत शक्तिशाली और पवित्र है किसी भी मंत्र से पहले यदि जोड़ दिया जाए तो वह पूर्णतया शुद्ध व शक्ति संपन्न हो जाता है।किसी देवी-देवता,ईश्वर के मंत्रों के पहले ॐ लगाना आवश्यक होता है। जैसे:- श्री राम का मंत्र “ओम रामाय् नमः”। विष्णु का मंत्र “ॐ विष्णु”।शिवजी का मन्त्र ॐ “नमः शिवाय” प्रसिद्ध हैं ॐ से रहित कोई भी मंत्र फलदाई नहीं होता चाहे उसका कितना भी जप हो।मंत्र के रूप में ॐ भी पर्याप्त है। एक बार ॐ का जाप हजार बार किसी ॐ रहित मंत्र के जाप से अधिक महत्वपूर्ण है।

छान्दोग्य उपनिषद् के अनुसार

“ॐ इत्येत अक्षर:”

अर्थात- ॐ अविनाशी, अव्यय, एवं क्षरण रहित है,ॐ धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष इन चारों का प्रदायक है।मात्र ॐ का जाप कर कई साधकों ने अपने उद्देश्य की प्राप्ति कर ली कोशीतकी ऋषि निसंतान थे। उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए सूर्य का ध्यान कर ॐ का जाप किया तो उन्हें पुत्र प्राप्ति हुई। गोपथ ब्राह्मण में उल्लेख है,जो कुश के आसन पर पूर्व की ओर मुख कर एक हजार बार मंत्र का जाप करता है उस के सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं।

“सिद्धयन्ति अस्य अथो:सर्वकर्माणि च:”

श्रीमद्भागवत में ॐ के रहस्य को कई बार रेखांकित किया गया है श्री गीता जी के आठवां अध्याय में उल्लेख मिलता है कि, जो ॐ अक्षर रुपी ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ शरीर त्याग करता है वह परम गति को प्राप्त होता है। प्रणव का बोध कराने के लिए उसके अवयव का विश्लेषण आवश्यक है।ॐ शब्द तीन अक्षरों से मिलकर बना है। यहां प्रसिद्ध आग़मों के अनुसार ओंकार के अवयवों के नाम हैं-अ,उ, म, बिंदु, अर्ध चंद्र, रोधिनि, नाद,नादान्त,शक्ति, व्यापिनियां,महाशून्य,समना तथा उन्मना इनमें से (अ)अकार, (उ)उकार, (म)मकार यह तीन सृष्टि,स्थिति,संहार के संपादक ब्रह्मा, विष्णु, महेश (रुद्र) के वाचक हैं।बिंदु तुरीय दशा का धोतक है।विक्षिप्त भूमि से एकाग्र भूमि में पहुंचने पर प्रणव की (ँ) मात्रा में स्थिति होती है, एकाग्र से निरोध अवस्था में जाने के लिए इस एम मात्रा का भी भेद कर अर्धमात्रा(ं)मेँ प्रविष्ट हुआ जाता है। तदुपरांत क्रमशः सूक्ष्म से सूक्ष्मतर मात्राओं का भेद करना पड़ता है बिंदु अर्धमात्रा है उसके अनंतर प्रत्येक स्तर में मात्राओं का विभाग है समना भूमि में जाने के बाद मात्राएं इतनी सूक्ष्म हो जाती हैं कि किसी योगी अथवा योगीश्वर के लिए उसके आगे बढ़ना संभव नहीं होता अर्थात् मात्रा अविभाज्य हो जाती है।आचार्यो का उपदेश है की इस स्थिति में मात्राओं को समर्पित कर अमात्र भूमि में प्रवेश करना चाहिए।इसका थोड़ा सा आभास मांडूक्य उपनिषद में मिलता है, बिंदु मन का ही रुप है, मात्रा विभाग के साथ-साथ मन अधिकाधिक सूक्ष्म होता चला जाता है। अमात्र भूमि में मन काल कल्ना देवता और प्रपंच लिए कुछ भी नहीं रहते इसी को उन मनी स्थिति कहते हैं। वहां स्वयं प्रकाश ब्रह्म निरंतर प्रकाशमान होता रहता है। तंत्र शास्त्र में इस प्रकार का मात्रा विभाग योग भूमियों के नाम से प्रसिद्ध है।इस प्रसंग में यह माननीय है कि बिंदु अवशिष्ट भेदों के अभेद ज्ञान का ही नाम है और नाद उनके विमर्शन का नाम है। इस स्थिति में योगी को सब पदार्थों का ज्ञान (सर्वज्ञत्व) प्राप्त हो जाता है, और बिंदु भेद हो जाने पर नाद ही अवशिष्ट रहता है एवं नाद से नादांत तक की गति में नाद का भी भेद हो जाता है।उस समय कला या शक्ति ही विद्यमान रहती है।जहाँ शक्ति या चित् शक्ति प्राप्त हो गई, वहां ब्रह्म का प्रकाशमान होना स्वत: ही सिद्ध है।

इस प्रकार प्रणव के उच्चारण से सूक्ष्म श्रवण के द्वारा विश्व का भेद होने पर विश्वातीत तक की सत्ता की प्राप्ति हो जाती है।जैसे:- चांद तंत्र में यह दिखाया गया है कि किस प्रकार अर्ध गति में कारणों का परित्याग होते-होते अखंड पूर्णत्व की स्थिति हो जाती है।”अ” ब्रह्म का वाचक है उच्चारण द्वारा हृदय में इसका त्याग होता है। “उ” विष्णु का वाचक है,कंठ में इसका त्याग होता है,”म” रुद्र का वाचक है और इसका त्याग तालूमध्य में होता है।इसकी प्रणाली से ब्रह्म ग्रंथि (थाइमस ग्रंथि), विष्णु ग्रंथि (थायराइड ग्रंथि) व रूद्र ग्रंथि (पिनियल ग्रंथि या ध्यान ग्रंथि) का छेदन हो जाता है तदन्तर बिंदु है।जो स्वयं ईश्वर रूप है अर्थात बिंदु से क्रमशः ऊपर की ओर वाच्य- वाचक का भेद नहीं रहता है।भ्रूमध्य में बिंदु का त्याग होता है।नाद सदाशिव रुपी है। ललाट से मूर्धा तक के स्थान में उसका त्याग करना पड़ता है,यहां तक का अनुभव स्थूल है।इसके आगे शक्ति का व्यापिनी तथा सामना भूमियों मे सूक्ष्म अनुभव होने लगता है। इस भूमि के वाच्य शिव् हैं, जो सदाशिव से ऊपर तथा परमशिव से नीचे रहते हैं।मूर्धा के ऊपर स्पर्श अनुभूति के अनंतर शक्ति का भी त्याग हो जाता है एवं उसके ऊपर व्यापिनी का भी त्याग हो जाता है।उस समय केवल मनन मात्र रुप का अनुभव होता है।यह सामना भूमि का परिचय है।इसके बाद मनन का त्याग हो जाता है।इसके उपरांत कुछ समय तक मन के अतीत विशुद्ध आत्मस्वरुप की झलक दिखाई पड़ती है।उसके अनंतर ही परमानुग्रह प्राप्त योगी का उन्मना शक्ति में प्रवेश होता है।इसी को परमपद या परमशिव की प्राप्ति समझना चाहिए और इसी को उन्मना का त्याग भी माना जा सकता है। इस प्रकार ब्रह्म से शिव पर्यंत छ: कारणों उल्लंघन हो जाने पर अखंड परिपूर्ण सत्ता में स्थिति को जाती है। ध्यान बिंदु उपनिषद के अनुसार पवित्र या अपवित्र सभी स्थितियों में ॐ का जाप करने वाले व्यक्ति को उसके लक्ष्य की प्राप्ति अवश्य होती है। जिस प्रकार कमल दल पर जल नहीं ठहरता है,उसी प्रकार जपकर्ता के चित्त पर कोई कलुष नहीं लगता अर्थात संस्कार नहीं बनता।सनातन धर्म ही नहीं दुनिया के अन्य धर्म दर्शनों में भी ॐ को महत्व प्राप्त है। संत कबीर निर्गुण भक्ति धारा के संत व कवि थे। उन्होंने भी ॐ के महत्व को स्वीकार करते हुए इस पर साखीयाँ लिखीं ।

ओं ओमकार आदि मै जाना।

लिखी ओं मिटे ताहि ना माना।।

ओं ओंकार लिखे जो कोई।

सोई लिखा मेटना ना कोई।।

गुरु नानक ने ॐ के महत्व को प्रतिपादित करते हुए लिखा है

“इक ओंकार सतनाम”

व्याख्या:- उस एक का जो नाम है वही ओंकार है।और सब नाम तो आदमी के दिए हुए हैं।राम कहो, कृष्ण कहो, अल्लाह कहो, ये हमने बनाए हैं। लेकिन उसका एक नाम जो हमने नहीं बनाया “ओंकार” अर्थात ॐ है। क्यों ओंकार उसका नाम है? क्योंकि! जब शब्द खो जाते हैं और चित्त शून्य हो जाता है तब ॐ की धुन सुनाई पड़ती है।वह हमारी बनाई हुई धुन नहीं है वह अस्तित्व की धुन है। एक ध्वनि है, कोई उसका स्रोत नहीं है, कोई उसको पैदा नहीं करता।जैसे जल प्रपात के पास बैठो तो उसकी एक ध्वनि है। लेकिन वह पानी व चट्टान की टक्कर से पैदा होती है। हवा का झोंका निकलता है तो सरसराहट होती है। वह हवा व वृक्षों की टक्कर से पैदा होती है। संगीतज्ञ गीत गाता है वीणा का कोई तार छेड़ता है। लेकिन यह सभी धुन संघर्ष से पैदा होती है। संघर्ष के लिए दो जरूरी है, तार चाहिए वीणा के और हाथ चाहिए छेड़ने वाला ।इस प्रकार जितनी ध्वनियाँ हैं द्वैत से पैदा होती हैं। उनमें से कोई भी उसका (परमात्मा का) सच्चा नाम नहीं हो सकता, उसका नाम तो वही है जब सारा द्वैत खो जाता है, तब जो एक ध्वनि गूंजती रहती है। नानक कहते हैं वही उसका नाम है। नानक गुरु ग्रंथ साहिब में बहुत बार नाम शब्द का प्रयोग करते हैं कहते हैं उसके नाम की रटन में जो डूब जाएगा वह उसे पा लेगा। नाम जब भी नानक कहते हैं, तब उनका इशारा ओंकार की तरफ है। क्योंकि वही एक उसका नाम है जो हमने नहीं दिया।

यहां सत् शब्द का समझ लेना चाहिए, संस्कृत में मिलते जुलते शब्द हैं सत् और सत्य, सत् का अर्थ होता है, अस्तित्व (एग्जिस्टेंस),जबकि सत्य का अर्थ है ट्रुथ। मूल धातु तो एक है।लेकिन कुछ फर्क है जिसे समझ लेना जरूरी है। सत्य तो चिंतक की खोज है वह खोजता है कि दो और दो मिलकर चार होते हैं पांच नहीं होते तीन भी नहीं होते गणित का यह सूत्र सत्य है लेकिन सत् नहीं है क्योंकि मनुष्य का ही हिसाब है हम सपना देखते हैं रात को सपना सत् तो है सत्य नहीं है सपना है। और है भी नहीं होता तो देखते कैसे लेकिन तुम यह नहीं कह सकते कि सत्य है क्योंकि सुबह पाते हो कि वह न होने के बराबर है लेकिन वह हुआ जरूर था एक सपना घटा था तो दुनिया में ऐसी घटनाएं हैं जो सत हैं लेकिन सत्य नहीं गणित सत्य है सत नहीं और सपना सत् है सत्य नहीं। परमात्मा दोनों है सत्य भी सत् भी और इसीलिए उसे ने तो गणित से पाया जा सकता है न विज्ञान से। विज्ञान खोजता है सत्य को और कल्पना कला की खोज है। सबको इसलिए न कला उसे पूरा खोज सकती है न ही विज्ञान दोनों अधूरे हैं तो जब नानक कहते हैं एक ओंकार सतनाम तो इस सूत्र में दोनों हैं सत्य भी और सत् भी। परम तत्व का नाम जो गणित की तरह सच है और काव्य की तरह सत् भी है। ॐ जो गणित की तरह सत्य है एवम् स्वप्न की तरह मधुर है जो मस्तिष्क कि इस प्रतीति की तरह के भी है हृदय की भावना की भांति भी है जहां मस्तिष्क और हृदय मिलते हैं वहीं धर्म शुरु होता है। मगर मस्तिष्क अकेला रहे और ह्रदय को छोड़ दे तो विज्ञान पैदा होता है अगर हृदय अकेला रहे और मस्तिष्क को दवा दे तो कल्पना और कला पैदा होती है अगर मस्तिष्क और हृदय दोनों मिल जाएं और दोनों का सहयोग हो जाए तब हम उन कारक में प्रवेश करते हैं। इस प्रकार प्रणव का जाप व भ्रमरी प्रणायाम करके नाद(ॐ ध्वनि) को  सुनने के अभ्यास किया जाता है  जिससे हमारे मन में है वह ध्वनि बहुत अच्छे से अभ्यासित व अंकित हो जाए।व नाद योग अभ्यास के दौरान ॐ की ध्वनि को सन्नाटे की ध्वनि के बीच आसानी से पहचाना जा सके। ज्ञात हो कि इसी ॐ की ध्वनि को सुनते हुए आत्मा शरीर के सभी प्राणों को ह्रदय में एकत्रित कर शरीर के बाहर निकलकर स्वयम के सत्य को शत् प्रतिशत जानता है वह यह जानता है शरीर से बाहर जाने के बाद भी उसका अस्तित्व है। प्रणव की ध्वनि से मन जैसे ही जरा भी विचलित होता है एक क्षण में जीवात्मा पुन: शरीर में प्रवेश कर जाता है प्रवेश के समय शरीर में एक झटका सा लगता है। अमृतत्व के बोध से उत्साहित वह आनंदित हो उठता है परंतु कुछ समय पश्चात जब यह उत्साह व आनंद का अतिरेक शांत होता है तो उसका विपरीत चिंतन इस प्रकार प्रारंभ होता है। यदि मै अजर अमर अविनाशी हूँ अर्थात शरीर से बाहर निकलने के बाद भी मैं हूं अर्थात कभी नहीं मरूंगा तो, आखिर मै कब से हूँ 100 साल से हूँ, 1000 या 1 लाख साल से हूं तो स्वयं से उत्तर मिलता है हमेशा से हूं अर्थात सतयुग, द्वापर, त्रेता व युगों-युगों से हूं कब तक रहूंगा उत्तर मिलता है युगों-युगों तक रहूंगा या हमेशा तक रहूंगा। तब वह योगी स्वयम को अनवरत चलने वाली दिनचर्या व जन्म मरण के चक्कर में फंसा हुआ महसूस करता है व इस एक समान व अनंत काल तक चलने वाले कार्यक्रम को अरुचिपूर्ण देख कर स्वयं कोसे इस प्रक्रिया से स्वतंत्र  करना चाहता है। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि जब तक हम जानते हैं कि हम मरेंगे तब तक हम जीना चाहते हैं और जैसे ही इस बात का ज्ञान होता है कि हम चाह कर भी मर नहीं सकते तो हम स्वयं को इस चक्र से मुक्त करना चाहते हैं स्वतंत्र करना चाहते हैं मोक्ष चाहते हैं मुक्ति चाहते हैं।

     इस प्रकार स्वार्थ योग विधि से ॐ का जप स्वयं के जीवन मूल्यों के प्रति जिम्मेदारी का ज्ञान व मोक्ष शास्त्रों के अध्ययन विधान, साधक के मन में आत्म ज्ञान के लिए जिज्ञासा को बढ़ाने व संसारिक व्यवहार के प्रति सजगता व् जिम्मेदारी को बलवती करने हेतु किया गया है।

सांख्य दृश्यमान विश्व को प्रकृति-पुरुष मूलक मानता है। उसकी दृष्टि से केवल चेतन या केवल अचेतन पदार्थ के आधार पर इस जगत् की संतोषप्रद व्याख्या नहीं की जा सकती। इसीलिए लौकायतिक आदि जड़वादी दर्शनों की भाँति सांख्य न केवल जड़ पदार्थ ही मानता है और न अनेक वेदांत संप्रदायों की भाँति वह केवल चिन्मात्र ब्रह्म या आत्मा को ही जगत् का मूल मानता है। अपितु जीवन या जगत् में प्राप्त होने वाले जड़ एवं चेतन, दोनों ही रूपों के मूल रूप से जड़ प्रकृति, एवं चिन्मात्र पुरुष इन दो तत्वों की सत्ता मानता है।जड़ प्रकृति सत्वरजस एवं तमस् – इन तीनों गुणों की साम्यावस्था का नाम है।  इसके अनुसार प्रकृति से महत् या बुद्धि, उससे अहंकार, तामस, अहंकार से पंच-तन्मात्र (शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गंध) एवं सात्विक अहंकार से ग्यारह इंद्रिय (पंच ज्ञानेंद्रिय, पंच कर्मेंद्रिय तथा उभयात्मक मन) और अंत में पंच तन्मात्रों से क्रमश: आकाश, वायु, तेजस्, जल तथा पृथ्वी नामक पंच महाभूत, इस प्रकार तेईस तत्व क्रमश: उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार मुख्यामुख्य भेद से सांख्य दर्शन 25 तत्व मानता है। 

सांख्य दर्शन के २५ तत्व

आत्मा (पुरुष)

अंत:करण (4) : मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार

ज्ञानेन्द्रियाँ (5) : नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कर्ण

कर्मेन्द्रियाँ (5) : पाद, हस्त, उपस्थ, पायु, वाक्

तन्मात्रायें (5) : गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द

महाभूत (5) : पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश

सूक्ष्म ज्ञानेंद्रियां- सुनने की चेष्टा- कान, महसूस करने की- त्वचा, देखने की- आंख, स्वाद लेने की- जीभ, सूंघने की चेष्टा- नाक, बोलने की-मुंह, चलने की- पैर, करने की- हाथ, मैथुन की- उपस्थ,मल त्याग की गुदा क्रमशः आकाश वायु अग्नि जल पृथ्वी यह पंच तत्व ज्ञानेन्द्रियों व कर्म इंद्रियों का प्रतिनिधित्व करते है। “यथा पिंडे तथा ब्रम्हांडे” जो शरीर में है वही ब्रह्माण्ड में है के आधार पर यह सभी तत्व हमारे भीतर बुद्धिमान हैं यदि इन सभी तत्वों को स्थूल, सूक्ष्म व अतिसूक्ष्म के स्तरों में वर्गीकृत किया जाए तो हमारा संपूर्ण अस्तित्व तीन शरीरों या स्तरों से बना हुआ है।

(1)स्थूल शरीर(शारीरिक स्तर)= पंच कर्म इंद्रियां+पंच ज्ञानेंद्रियां+पंचमहाभूत (2)सूक्ष्म शरीर (मानसिक स्तर)=मन ,बुद्धि, चित्त अहंकार (स्वयं को महसूस करने का गुण)

(3)कारण शरीर(आत्मिक स्तर)= आत्मा

(1.)स्थूल शरीर- स्थूल शरीर को दिखने वाले शरीर के रुप में जाना जाता है मृत्यु के बाद जीवात्मा जिस शरीर को छोड़कर चला जाता है वह स्थूल शरीर है यह पंच ज्ञानेंद्रिय( कान त्वचा,आँख, जीभ, नाक) पंच कर्मेंद्रिय (गुदा उपस्थ,हाथ,पैर और मुह) व पंच महाभूत भूमि, जल,अग्नि, वायु, आकाश से बना होता है इसमें भी वायु तत्व (प्राण तत्व) के पांच प्राण (प्राण, उदान,समान,अपान, व्यान)  पांच उप प्राणों (नाग ,कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनञ्जय)में से धनंजय उपप्राण के अतिरिक्त सभी उपप्राण जीवात्मा के साथ निकल जाते हैं ज्ञात हो धनंजय उपप्राण कारण ही हमारा शरीर मृत्यु के पश्चात संगठित रहता है धीरे-धीरे यह उपप्राण भी शरीर से रिसता रहता है और शरीर का विघटन प्रारंभ हो जाता है ।शरीर सड़ना प्रारंभ हो जाता है जिस से आत्मा का संबंध व आसक्ति शरीर से बनी रहती है।सनातन धर्म में जला कर अंतिम संस्कार करने से वह उप प्राण भी शीघ्र मुक्त होकर जीवात्मा से संयुक्त अन्य प्राणो से मिल जाता है जिससे आत्मा का शरीर से आसक्ति जल्दी कम हो जाती है।

(2.) सूक्ष्म शरीर:- सूक्ष्म शरीर को मानसिक शरीर भी कहा जाता है यह ना दिखने वाले पर आसानी से अनुभव गम्य तत्वों मन बुद्धि चित्त अहंकार गुरु तत्वों का योग है। विचार भाव संवेदनाएं आदि इसी शरीर के अंतर्गत आती है इनमें दसों इंद्रियों की चेष्टायें सूक्ष्म इंद्रियां कहलाती है जैसे सुनने की चेष्टा (सूक्ष्म कर्ण इंद्री), सूंघने की चेष्टा (सूक्ष्म घ्राण इंद्री), स्पर्श चेष्टा (सूक्ष्म त्वक् इंद्री), देखने की चेष्टा( सूक्ष्म चक्षु इंद्री), स्वाद की चेष्टा (सूक्ष्म जिव्हा इंद्री) इसी प्रकार चलने की चेष्टा, करने की,मैथुन की,बोलने की मल त्याग की चेष्टा क्रमशः सूक्ष्म पाद,हस्त,उपस्थ,मुख,गुदा इन्द्रियां सूक्ष्म शरीर का ही भाग है यही चेष्टाऐ (सूक्ष्म इंद्रियां) पुनर्जन्म के लिए जीवात्मा के माता के गर्भ में स्थापित होने पर पंच महा भूतों का उपभोग कर स्थूल इंद्रियों के रूप में परिणत होने लगती हैं साधारण जीवन में भी हम देखते हैं कि हमारी इच्छा होने पर ही कोई भी निर्माण होता है प्रत्येक निर्माण से पहले उस निर्माण की इच्छा,कल्पना, चिंतन, संकल्प होता है योगियों द्वारा अंतर्ध्यान व दृश्य होने की प्रक्रिया में भी पंच तत्वों का संकल्प से विलय और संग्रह किया जाता है एक आत्मा जब दृश्य शरीर में अवतरित होती है तो भ्रूण शरीर 0 से 1 ग्राम, 1 से 10 ग्राम, 10 से 100 ग्राम वजन हो जाना भी पंचतत्व संचय प्रक्रिया का प्रतीक है जीवात्मा ही अपने संकल्प या चेष्टा रुपी सूक्ष्म इंद्रियों से इन पञ्च महाभूतों का आकर्षण करता है इससे इस बात की भी पुष्टि हो जाती है कि मृत्यु के समय शरीर त्यागने पर महतत्त्व (बुद्धि तत्व) सूक्ष्म शरीर के साथ नहीं जाता है क्योंकि गौर तलब है की ज्यों ज्यों शरीर में पंचतत्व बढ़ रहे हैं क्यों क्यों महतत्व बढ़ता है व ज्यों-ज्यों बुढ़ापे में क्षरण की स्थिति के कारण वजन  कम होता है त्यों-त्यों महतत्व (बुद्धितत्व)भी कम होता जाता है। बचपन में चेष्टाओं का आधिक्य होता है। बुढ़ापा आते-आते चेष्टाएँ लुप्त प्रायः हो जाती हैं। मृत्यु के उपरांत जब जीवात्मा शरीर से बाहर निकलता है तो सुक्ष्म शरीर भी उसके साथ ही रहता है इस सूक्ष्म शरीर में बुद्धि (महतत्व) नही रहता है वह स्थूल शरीर से वियोग के साथ ही लुप्तप्राय हो जाता है क्योंकि बुद्धि तत्व  सूक्ष्म शरीर,कारण शरीर , व स्थूल शरीर  के योग का परिणाम है  जैसा कि  सांख्ययोग में भी वर्णित है  की  चेतन  पुरुष  और  जड़  त्रिगुणात्मक प्रकृति  अर्थात पंचमहाभूतों से बनी प्रकृति  का योग होता है तब महतत्व  (बुद्धि तत्व) का उदय होता है। 

इसी कारण स्थूल शरीर त्यागने पर जीवात्मा आसक्ति युक्त तो रहता है परंतु तर्क वितर्क नहीं कर सकता वह अपनी पूर्व आसक्ति व संस्कारों के कारण सपने जैसी स्थिति में रहता है ज्ञात हो शरीर मृत्यु से पहले चेतना शून्य होना होश में न रहना व पूर्व जन्म की याद न रहना इसी प्राकृतिक नियम के प्रमाण है कुछ अवस्थाओं में जैसे आकस्मिक दुर्घटना होने पर, योग साधना से प्राणों को वश में कर इच्छा से प्राण त्याग आदि में स्थूल शरीर और बुद्धि अंश बुद्धि तत्व सूक्ष्म शरीर के साथ चला जाता है जिस कारण एेसे जीव आत्माओं को अपने पूर्व जन्म की याद रह जाती है व यही वह आत्माएं है जो स्थूल अंश (पंचतत्व अंश )के कारण लोगों को दिखाई दे जाते हैं इस प्रकार हम दृश्य (दिखने वाले)अर्थात स्थूल व अदृश्य (न दिखने वाले) अर्थात सूक्ष्म तत्वों से मिलकर बने हैं जैसा कि हम जानते हैं जिन तत्वों को हम देख कर जानते हैं उनका प्रत्यक्ष ज्ञान हमें होता है अतः वह आसानी से जाने जा सकते हैं परंतु जो सूक्ष्म या अदृश्य तत्व हैं उन्हें जानने के लिए हमें अतिरिक्त मानसिक योग्यता व एकाग्रता की आवश्यकता होती है वह साधना द्वारा मन की बोद्ध गम्यता व क्षमता को बढ़ाना पड़ता है अतः इसी उद्देश्य से तत्वों का विवेचन स्थूल से सूक्ष्म के क्रम में क्या जा रहा है। जिससे कम मानसिक योग्यता वाले व्यक्ति को भी साधना का आधार मिल सके व उसका विश्वास प्रगाढ़ हो सके कि यदि वह इस शतत् श्रेष्ठता वर्धन की प्रक्रिया में शामिल हो गया तो वह भी परिणाम स्वरुप श्रेष्ठ तम बिंदु परमात्मा तक पहुंच सकता है तत्वों को स्थूल से सूक्ष्म के क्रम में अर्थात आसानी से बुद्धि गम्यता से कठिनता से बुद्धिगम्य के क्रम में इस प्रकार रखा जा सकता है पृथ्वी से सूक्ष्म जल, जल से सूक्ष्म अग्नि, अग्नि से  सूक्ष्म वायु, वायु से सूक्ष्म आकाश, आकाश से  सूक्ष्म मन, मन से सूक्ष्म बुद्धि, बुद्धि से सूक्ष्म चित्त, चित्त से सूक्ष्म अहंकार, अहंकार से सूक्ष्म आत्मा, आत्मा से सूक्ष्म परमात्मा तत्व हैं। जैसे जैसे हमारे ध्यान की प्रगाढ़ता होती जाती है वैसे वैसे एक के बाद एक सूक्ष्म से सूक्ष्म तत्व का ज्ञान हमें होता जाता है अंततः हम आत्मा या परमतत्व जो कि इस जगत का सूक्ष्मतम तत्व है को भी जान लेते हैं यही स्वार्थ= स्वयं का अर्थ ,अर्थात आत्मा का अर्थ जानना स्वार्थ योग का लक्ष्य है।इस स्वार्थ योग साधना विधि से ॐ जप करने से इन तत्वों की विवेचन की योग्यता अर्थात स्वाध्याय की योग्यता अत्यंत शीघ्रता से बढ़ जाती है जिससे  आत्मज्ञान की संभावना भी अत्यधिक बढ़ जाती है  यदि साधक  इस  स्वार्थ योग विधि  के द्वारा  साधना करें तो उनका योग साधना का लक्ष्य अत्यंत सरल व सुगम हो सकता है इसकी विधि के विषय में अन्य पृष्ठ पर जानकारी दी गई है।

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