आज की आवश्यकता “शिक्षा आधारित वोट मूल्यांकन” ?

मेरे आत्मस्वरूप,

देश भक्त मित्रों, साथियों, वरिष्ठ जनों

विषय- 70℅ रोगों की जड़ “तनाव” की मुक्ति व सनातन एकता का सर्वोत्तम साधन “ॐ कुंडलिनी साधना” के प्रशिक्षण व “क्या लोकतंत्र में जितना अधिक शिक्षा स्तर उतने अधिक वोट अंक के सिद्धांत पर वोट मूल्यांकन होना चाहिए?” बिषय पर परिचर्चा आयोजित करने हेतु।
श्रीमान जी, जैसा कि हम सभी जानते हैं कि शिक्षा हम सभी के जीवन में जीवन मूल्यों से संबंधित निर्णयों में गलती की संभावना कम करती है। व हमारी समझ को बढ़ाती है अर्थात एक अशिक्षित व्यक्ति से एक शिक्षित व्यक्ति के निर्णय में गलती की संभावना बहुत ही कम होती है। यदि वोट को एक व्यक्ति की समझ के आधार पर निर्णय या सलाह माना जाए। तो एक शिक्षित व्यक्ति की सलाह या निर्णय में गलती की बहुत कम संभावना होगी। इसी आधार पर योगीज सेना वोटिंग प्रक्रिया का ऐसा मॉडल प्रस्तुत करना चाहती है। जिससे देश के शिक्षित मस्तिष्क की समझ का सही मूल्यांकन व सदुपयोग हो सके। इस हेतु एक अशिक्षित व्यक्ति का -1 वोट अंक, हाई स्कूल पास व्यक्ति- 2 वोट अंक, ग्रेजुएट-3 वोट अंक,पोस्ट ग्रेजुएट- 4 वोट अंक, पी एच डी व अन्य विशेष योग्यता-5 वोट अंक,आई ए एस व समतुल्य -10 वोट अंक, विधायक- 20 वोट अंक, मंत्री विधायक- 30 वोट अंक,सांसद- 40 वोट अंक,मंत्री सांसद- 50 वोट अंक, प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति के आसपास की कैटेगरी – लगभग 500 वोट अंक हो। तभी हम सिर गिनने किब बजाय मस्तिष्कों का मूल्यांकन कर सकेंगे।
लाभ- बर्तमान मॉडल में अशिक्षित व कम शिक्षित की वोटिंग प्रतिशतता अधिक होने के कारण देश के भविष्य के निर्णायक अशिक्षित व कम शिक्षित (Tax benifit receiver) होते हैं।इसलिए नेताओं द्वारा चुनाव में इन्हें खूब नैतिक रिश्वत रूपी अनावश्यक लाभ (रेवड़ियां) देने की होड़ लग जाती है।और जो ज्यादा रेवड़ियां देने का वादा करता है उसी की सरकार बन जाती है। परंतु इस अपेक्षित मॉडल में निर्णायक की भूमिका में शिक्षित (Tax payer) होंगे।उनका पैसा उनकी मर्जी से गरीब की सेवा में सही ढंग से खर्च हो, न कि अनावश्यक लाभ का लालच देने रूपी नैतिक वोट खरीद फरोख्त में, इसलिए भी निर्णायक शिक्षित को ही होना चाहिये। जिससे योग्य नेताओं का राजनीति में प्रवेश बढ़ेगा व राजनीतिक प्रदूषण में कमी आएगी । वर्तमान मॉडल के कारण नेताओं की 90% मानसिक ऊर्जा जातिगत समीकरण साधने में खर्च होती है। जबकि अपेक्षित मॉडल के लागू होने की स्थिति में नेता कुछ इस प्रकार सोचेंगे।कि मेरे क्षेत्र में कितने अशिक्षित, कितने शिक्षित, कितने उच्च शिक्षित आदि है? कितने प्रौढ़ शिक्षा ले रहे हैं? कितने बच्चों की शिक्षा किस किस कक्षा में चल रही है? किसी की शिक्षा बंद तो नहीं हो गयी? शिक्षा संसाधन रोजगार परक है या बेरोजगारी बढ़ाने वाले हैं? प्रत्येक नेता को शिक्षा मंत्री व रोजगार मंत्री की तरह सोचने को विवश होना पड़ेगा।गौरतलब है कि 65 प्रतिशत आबादी 40 साल की उम्र की युवा है।जिसकी शिक्षा व रोजगार पर आज ध्यान नही गया तो उसे बुढापा आने पर देश पर बहुत बड़ा बोझ बढ़ने वाला है। साथ ही इससे जातिगत राजनीति में 75% तक कमी आ जायेगी। जिससे सामाजिक सद्भाव बढ़ेगा। व राजनीतिक फोकस शिक्षा व रोजगार होने से विकास बढेगा।
सबसे बड़ा लाभ- जो समाज अंधाधुंध अशिक्षित आबादी रूपी समस्या बढ़ाकर राज करने का सपना देखते हैं उनके गलत मनसूबों की हवा निकल जाएगी।व उन्हें भी शिक्षा की ओर कदम बढ़ाना पड़ेगा। उनके शिक्षित होते ही उनके द्वारा पैदा की जा रही बहुत सी समस्याओं, जिनका वह खुद भी शिकार हो रहे हैं, का स्वतः बड़ी मात्रा में निराकरण हो जायेगा।
अतः लोकतंत्र में व्यक्ति के सिर की गिनती होने के बजाय व्यक्ति के शिक्षा स्तर के अनुसार उसकी निर्णय क्षमता व समझ का मूल्यांकन हो।
इस हेतु एक अच्छा ड्राफ्ट तैयार करने व इस मुद्दे को चर्चित बनाने हेतु इस विषय पर शिक्षित वर्ग, शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों से परिचर्चाओं के क्रम में आपके माध्यम से आपके साथियों, सहकर्मियों के साथ भी एक परिचर्चा आयोजित किया जाना अपेक्षित है। कृपया अपना बहुमूल्य समय निकालकर उपर्युक्त विषय पर अपने संस्थान में एक परिचर्चा का आयोजन योग गुरु डॉ संजीव कुमार के सानिध्य में करवाने का कष्ट करें। आशा हैं इस राष्ट्र हित के कार्य को अवश्य प्रोत्साहित करेंगे। धन्यवाद।
शुभेच्छु
डॉ विकास कुमार
(राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी- योगीज⛳सेना-9897049762)

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