राष्ट्रीय अध्यक्ष का पीएम को पत्र

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YS/9/10/18/1
सेवा में,
प्रधानमंत्री जी, भारत सरकार
श्रीमान जी,
विगत सरकारों के आयातित संस्कृतियों के लिए प्रेम व ढुलमुल सरकारी नीतियों के कारण भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति को , आक्रांताओ द्वारा जबरन थोपी गयी विदेशी संस्कृतियों से तेजी से नुकसान हुआ है व हो रहा हैै। इस हानि के विभिन्न कारणों में मुख्य कारण यह है कि हम सामूहिक उपासना से विमुख हो गए हैं।आज हम सभी अकेले साधना करते हैं या साधना नही भी करते हैं,अनिवार्य तो कुछ है ही नहीं। जबकि वह रोज सामुहिक उपासना करते हैं या सप्ताह में , वह भी अनिवार्य रूप से ।अतः उनका आपस मे रोज या सप्ताह में मिलना हो जाता है।इसप्रकार उनके संगठित होने व एकमत होने का यह एक मजबूत माध्यम उन्हें उपलब्ध है। इसका प्रभाव उनके मन पर इतना अधिक हुआ है कि वह यह भूल ही गये हैं कि उनके पूर्वजों को यह संस्कृति हथियारों के जोर पर अपनाने को मजबूर किया गया था।तथा कितनी माताओं बहनों व उनके बच्चों को अपने पतियों व पिताओं को खो देने के कारण गुलाम बनकर इन संस्कृति को अपने प्राण बचाने के लिए अपनाना पड़ा था। बचपन जोकि कोरे कागज की तरह होता है, वर्तमान पीढ़ी के बचपन की इस कोमल मन वाली अवस्था से ही, 10 बर्ष के बाद पीटकर भी इस अभ्यास को कराने के बिधान के कारण, रोजाना कई बार मानसिक अभ्यास (धारणा) करने को मजबूर है। इसके चलते परिणाम यह है कि जिन विदेशी संस्कृतियों के कारण उन्होंने अपने पूर्वज खोये, संस्कृति, संपत्ति, औऱ धर्म खोने पड़े आज उन्ही विदेशी संस्कृतियों के लिए अपनी मूल संस्कृति वालों से लड़ जाएंगे। इसकी भरपाई तो नामुमकिन है लेकिन निम्म सुझावों पर अमल करके भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति के प्रोत्साहन से सुधार अवश्य किया जा सकता है। क्योंकि कोई भी राष्ट्र तभी तक स्थिर व सुरक्षित है जबतक उसकी मूल संस्कृति।इसलिए बड़ी आश्वस्त अपेक्षा के साथ योगीज सेना द्वारा निम्मलिखित माँगे व सुझाव आपको प्रेषित किये जा रहे हैं।
राष्ट्रहित में हमारी माँगे-
हमारे बहुत से आध्यात्मिक स्थलों के तहखानों में पड़े हुए अकूत धन के सदुपयोग हेतु संसद में चर्चा की जाए। जिससे उस धन को निम्मलिखित संस्कृति उत्थान के कार्यों में खर्च किया जा सके।
1. सूर्यास्त व सूर्योदय के समय, जबकि अनायास ही प्राकृतिक रूप से मन साधना में आकर्षित होता है, **प्रत्येक आध्यात्मिक स्थल में अनिवार्यतः मुख्य संचालक द्वारा प्रतिदिन सामुहिक ॐ कुंडलिनी साधना (29 बार ॐ का विशिष्ट विधि से जप) को अपने आध्यात्मिक स्थल, निकट आध्यात्मिक स्थल, सेवा स्थल, शिक्षण संस्थान, व्यापारिक संस्थान, घर आदि में प्रतिदिन प्रातः 6:00 व 9:00 बजे व सांय 6:00 बजे जीवन पर्यंत संचालित कराने का संकल्प करें।(आध्यात्मिक स्थलों के अतिरिक्त स्थलों पर सुविधानुसार निर्दिष्ट समय पर दो बार)आपका संकल्प ही हमारा समर्थन व बल है। इस अध्यात्मिक क्रांति को संपूर्ण भारत व विश्व में प्रसारित करने हेतु कृपया योगीज सेना का तन, मन, धन व स्थान से सहयोग करें। साथ ही प्रत्येक सप्ताह में मंगलवार के दिन विशेष पंद्रह मिनट की सामुहिक ॐ कुंडलिनी साधना का आयोजन अवश्य हो। जिससे कम रूचि लेने वाले व व्यस्त लोग भी कम से कम सप्ताह में एक बार अवश्य प्रतिभाग कर लाभ ले सकें।
इस सुयोजना को धरातल पर उतारने के संबंध में प्रत्येक जिलाधिकारी द्वारा उनके जिले के सभी आध्यात्मिक स्थलों के संचालकों को प्रधानमंत्री का एक अनुरोध पत्र प्रेषित किया जाय , गौरतलब है कि प्रधानमंत्री जी के अनुरोध पर लोग गैस सिलेंडर की सब्सिडी छोड़ना,नोटबन्दी व जनधन व आधार लिंक करने में पूर्ण धैर्य से गर्मी, बरसात, धूप में लाइन में लगने जैसे अनेक मुश्किल कार्य सकते हैं।तो यह कार्य तो आस्था का है।लोग यह आसान व पुण्य कार्य तो और भी अधिक उत्साहित होकर करेंगें। अतः इस हेतु आप अपना आदेश, अपने अनुरोध पत्र सहित सभी जिलाधिकारियों को प्रेषित करने का कष्ट करें। व अनुरोध पत्र देशभर में होडिंग द्वारा भी प्रचारित किया जाय।
(योगीज सेना के पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं द्वारा इस हेतु भिन्न भिन्न जिला व तहसील क्षेत्रों में इस विषय पर चर्चा आयोजित करने के निर्देश दिये जा चुके हैं। इस प्रकार ॐ विमर्श यज्ञ के माध्यम से आध्यात्मिक केंद्र संचालकों, विशिष्ट नागरिकों, समाजसेवीयों, संस्कृति प्रेमियों को विशेष निमंत्रण पत्र भेजकर प्रेरित करने का कार्य किया जा रहा है।साथ ही समर्थन व सहयोग करने वाली विभूतियों को संस्कृति रक्षक सम्मान से सम्मानित करने के कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है।)
क्योंकि ॐ का जप सर्व शक्तिशाली तो है ही यह सामूहिक साधना में गुणात्मक फलदाई है।अधिकतर आध्यात्मिक स्थलों का आकार पिरामिड आकार का होने से वहां ब्रह्मांडीय उर्जा का संचार अत्यधिक रहता है। जिससे अतिरिक्त ब्रह्मांडीय ऊर्जा लाभ के साथ आध्यात्मिक स्थलों में साधकों को ॐ सामुहिक कुंडलिनी साधना का उतने ही गुना अधिक लाभ बढ़ जाता है जितने लोग इस साधना में भाग लेते हैं।क्योंकि अन्य लोगों के जप की ध्वनि सुनने से भी सभी की आध्यत्मिक ऊर्जा में गुणात्मक वृद्धि करती है। जिससे उनके चेतना केंद्रों (चक्रों) के जागरण से जीवन में शीघ्रता से सार्थक बदलाव आते हैं। यह विज्ञान द्वारा भी प्रमाणित है। इसके अवर्णनीय लाभ हैं।
ॐ कुण्डलिनी साधना विधि –

वीडियो देखने के लिये https://youtu.be/bA4D22E27Ow लिंक पर विजिट करें।
नोट-साधना विधि की दिव्यता! अनुभव करने के लिए कम से कम 10 लोगों के समूह में अभ्यास करें, शब्दों से अनुभव करना असंभव है। इस राष्ट्र के लिए पहली बार यह गौरव की बात हैं, कि ऐसे गूढ़ आध्यात्मिक बिषयों का निर्णय करने के लिए हमारे प्रधानमंत्री बिना किसी विशेषज्ञ के निर्णय करने में सक्षम हैं।
विधि- सुविधानुसार पद्मासन , सुखासन ,सिद्धासन , वज्रासन में बैठे। गहरी सांस अंदर भरें। दोनों हाथों की उंगलियों के सिरो को मिलाकर अपने शिखा वाले स्थान (बिंदु चक्र) पर रखें व अ, उ का छोटा जाप करते हुए “म” को लंबा खींचते हुए दो बार ॐ का जाप करें व सभी मनुष्यों की हाथों की उंगलियों से प्राकृतिक रूप से निकलने वाली सकारात्मक ऊर्जा को प्रकाश के रूप में अपने चक्र में प्रवेश होता हुआ महसूस करें व ॐ के कंपन व प्रकाश ऊर्जा से चक्र को सक्रिय(जागृत) होते हुए महसूस करें। इसी प्रकार उंगलियों के सिरों को मिलाकर क्रमशः सहस्त्रसार, आज्ञा, विशुद्धि, अनाहत,मणिपुर चक्र पर शरीर के सामने की ओर से रखकर प्रकाश, स्वांस ,कम्पन व चक्र जागरण का अनुभव प्रत्येक चक्र पर करते हुए 2 -2 बार ॐ का जप करें। स्वाधिस्ठानचक्र पर पीछे की ओर से अंगुलियों के सिरे रखकर तथा अंगूठे व अनामिका के सिरे मिलाकर (पृथ्वी मुद्रा में ) मूलाधार पर ध्यान करते हुए 2-2 बार ॐ जपें।यही क्रम वापसी में प्रत्येक चक्र पर एक एक बार करना है।ततपश्चात 5 बार सम्पूर्ण शरीर मे ॐ का प्रभाव, प्रकाश,ऊर्जा व कम्पन अनुभव करते हुए अभ्यास करें।तत्पश्चात समय की उपलब्धता के अनुसार सन्नाटे की ध्वनि का ,शांति अर्थात शून्यता का अधिक से अधिक समय तक अनुभव करते रहें।इस प्रकार उंगलियों के सिरों को चक्रों पर रखने से चक्र जागरण हेतु ऊर्जा तो पहुचती ही है, चक्र पर मन भी सरलता से एकाग्र हो जाता है। साथ ही हाथों के द्वारा ॐ के कम्पनों का शरीर पर स्पष्ट अनुभव कर पाते हैं जिससे साधना के लाभों की वैज्ञानिकता से हमारा मन आश्वस्त हो जाता है।जोकि नियमित साधना में रूचि के लिए अत्यंत आवश्यक है। ॐ के जाप में श्वांस-प्रश्वांस अनायास ही जितनी व्यवस्थित चलती है, अन्य किसी भी प्राणायाम में प्रयास करने पर भी नही चलती।इसप्रकार ॐ कुंडलिनी साधना व प्राणायाम के इस अनायास संयुक्त अभ्यास से अंतसमय मे सदगति प्राप्त करने हेतु ॐ की ध्वनि सुनते हुए प्राणत्याग के लिए प्राणजय का भी अभ्यास हो जाता है। क्योंकि मृत्यु सभी को आनी है और बिना मृत्यु सदगति मिल नही सकती । तथा प्रत्येक को सदगति का यह अवसर एक जीवन मे एकबार ही मिलने वाला है। अतः जब यह अवसर आये तो इसका सदुपयोग कैसे हो? यह प्रत्येक मनुष्य को सीखना चाहिए।
2. *छोटे आध्यात्मिक स्थलों को “सामूहिक ॐ कुंडलिनी साधना” हेतु बड़ा करने के लिए भूमि की खरीददारी व बहुत से जीर्ण शीर्ण पड़े प्राचीन महत्व के आध्यात्मिक स्थलों का जीर्णोद्धार कराया जाए।*
3. *ऐसे आध्यात्मिक स्थल जो कि बड़े हैं व ॐ सामूहिक कुंडलिनी साधना के लिए उपयुक्त हैं। उनमें प्रत्येक में सही मानक के विशालकाय घंटों का लगवाना सुनिश्चित किया जाए।* जिससे आमजन को ॐ की ध्वनि का सही प्रारूप सुनने को मिल सके।
नोट- भगवान विष्णु के अवतार भगवान बुद्ध ने ॐ शब्द की जनसामान्य को सही उपलब्धता के लिए विशालकाय घंटों का आविष्कार किया। (छोटे घंटे व घंटियां अपभ्रंश है)
योग गुरु डॉ संजीव कुमार को ॐ की प्राकृतिक ध्वनि को सुनते हुए शरीर से बाहर निकलने (आत्म साक्षात्कार) का अनुभव प्राप्त है। अतः घंटों का मानक तय करने हेतु परामर्श अवश्य लें। जिससे ॐ की सही अभिव्यक्ति जन सामान्य को उपलब्ध हो सके।
4.इस ॐ अनुष्ठान के योजनाबद्ध व सफल क्रियान्वयन व रुचि उत्पन्न करने हेतु आमजन को ॐ के विषय में पर्याप्त व सही जानकारी उपलब्ध करानी होगी। अतः अंतराष्ट्रीय योग दिवस की तर्ज पर *”अंतराष्ट्रीय या राष्ट्रीय ॐ प्रचार दिवस या सप्ताह” की घोषणा की जाय।*
नोट- अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाए जाने के कारण सरकार के पास, इस कार्य हेतु पूरा तंत्र अनायास ही विकसित है।
5. ॐ के आध्यात्मिक, स्वास्थ्य, संपन्नता, सात्विक समाज निर्माण संबंधी ज्ञान का अधिकतम प्रचार हो सके व ॐ एक धार्मिक चिन्ह है, इस विषम मानसिकता को दूर करने हेतु सभी *आध्यात्मिक स्थलों के प्रतिनिधियों सेवादारों पुजारियों के लिए प्रशिक्षण स्थल व प्रक्षिक्षण की व्यवस्था की जाय।* जिससे सब एकमत हो सके कि ॐ प्रकृति की ध्वनि है। व जिसके जप से पीनियल, पिट्यूटरी, थाइरॉइड, थाइमस, एड्रिनल आदि सभी अंतःस्रावी ग्रंथियों के संतुलन से साधक के व्यवहार में तीव्र सात्विक परिवर्तन आते हैं व उसकी प्रसुप्त कुण्डलिनी व प्रतिभाएं जागृत होने से साधक का सात्विक व रचनात्मक ज्ञान शिखर छूने लगता है और ज्ञान सभी समस्याओं का स्वतः समाधान है ।
नोट- प्रशिक्षण प्रोत्साहन हेतु प्रशिक्षिण करने वाले व कराने वाले आध्यात्मिक विभूतियों को *एक निश्चित अनुदान राशि देने की व्यवस्था हो।व आध्यात्मिक केंद्र का संचालन प्रशिक्षित व्यक्ति के द्वारा किया जाना अनिवार्य हो।
6. *हज* की तर्ज पर सभी आध्यात्मिक विभूतियों को एकमत व एकजुट करने हेतु *प्रशिक्षण के लिए ॐ सर्व तीर्थ की स्थापना की जाय।जिसके लिए तीर्थों, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों, शहीदों, समाजसेवियों, आध्यात्मिक स्थलों, सिद्ध पीठों, योगसाधना के स्थलों से मिट्टी एकत्रित की जाए व उस संग्रहित दिव्य मिट्टी को केंद्रबिंदु बनाकर उसपर चेतना केंद्र के रूप में ॐ युक्त राष्ट्र ध्वज स्थापित किया जाए।* इस कार्यक्रम में योगदान करने वाली विभूतियों को, उनका यह योगदान वैश्विक स्तर पर संस्कृति प्रेमियों के ह्रदय का सम्राट बना सकता है। ट्रेनिंग में विशेष “सर्वांग योग साधना” व वैदिक मूल शिक्षा का भी अंश रहेगा।
7. सभी संस्कृतियों की *जनसंख्या में सही अनुपात बना रहे* इसके लिए कड़ा जनसंख्या कानून बनाना चाहिए।
8. *_ भारतीय संस्कृति के मूल स्रोत ॐ को भारतीय ध्वज में चक्र के स्थान पर स्थापित किया जाए। क्योंकि संस्कृति के मूल स्रोत के चिन्ह को भारत के ध्वज में होना ही चाहिए।_* जिसमें से 24 सूक्ष्म किरणें गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों की प्रतीक के रूप में निकलती हुई प्रदर्शित की गयी है। जिसका अर्थ है। उस उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे ( अपेक्षित राष्ट्रध्वज का फोटो संलग्न है)
नोट – ॐ से गायत्री मंत्र, गायत्री मंत्र से चारों वेद की रचना, चारों वेद से संपूर्ण ज्ञान, विज्ञान व सृष्टी की रचना हुई है। यह अनादि है और आध्यात्मिक ऊर्जा का सर्वमान्य व सर्वश्रेष्ठ स्रोत है। विज्ञान व चिकित्सा विज्ञान द्वारा अनेकों बार प्रमाणित है। भारतीय मूल संस्कृति का केंद्र है। अवर्णनीय है।
बहुत से संगठन भारतीय संस्कृति को हो रही इस हानि से गंभीरता से चिंतित हैं,और भरपायी हेतु मूल भारतीय संस्कृति को एकजुट करने का प्रयास करते रहे हैं।परंतु कोई विशेष योजना व स्पष्टता का अभाव होने के कारण इस कार्य में जितनी आजतक मेहनत की गयी उतनी अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। परन्तु यह सुयोजना इस अभाव को समाप्त कर हर भारतीय संस्कृति प्रेमी व सच्चे हिंदुस्तानी को प्रसन्नता प्रदान करेगी।
सौभाग्य से मौसम का मिजाज भी ऐसा बदला है कि बड़े बड़े नेता मंदिर जाने लगे हैं, जनेऊ पहनने लगे हैं, दुर्गा पूजा करने लगे हैं व कम्बोडिया जितना भव्य विष्णु मंदिर बनाने की घोषणा करने लगे हैं।मौसम की इस अनुकूलता के बीच सम्माननीय वर्तमान राष्ट्रध्वज को सर्वोच्च, सर्वोत्तम व परमसम्मानीय बनाने के उद्देश्य से राष्ट्रध्वज का ॐ-युक्त नवीन प्रारूप प्रस्तुत करते हुए,योगीज सेना का यह विनम्र निवेदन है, कि संसद में उपर्युक्त बिंदुओं पर शीघ्रातिशीघ्र चर्चा कर संस्कृति उत्थान यज्ञ (2019) का उदघोष करें। गौरतलब है कि भारत की पहचान भारत का अध्यात्म है अतः भारत जैसे श्रेष्ठतम व प्राचीनतम आध्यात्मिक संस्कृति, वैदिक संस्कृति के धनवान राष्ट्र का राष्ट्र ध्वज भी सर्वश्रेष्ठ प्रतीकों से परिपूर्ण होना चाहिए। जिनका स्पष्ट प्रभाव आमजन के मन पर स्थापित हो। वर्तमान भारतीय ध्वज के बीच 24 तीलियों के चक्र का भारतीयों के मन पर उसके अर्थ का पता न होने के कारण कोई प्रभाव नहीं दिखाई पड़ता है।अतः यह अच्छा तो है परंतु अप्रभावी भी है। जबकि अपेक्षित राष्ट्र ध्वज में प्रयुक्त ॐ का अर्थ जनमानस को अधिक गहराई से छूने वाला व परम् आध्यात्मिक है व ॐ संपूर्ण जगत को चलाने वाली प्राकृतिक ध्वनि शक्ति है। हालाँकि कुछ अज्ञानी जन इसे धार्मिक मानते हैं परंतु असंख्य शास्त्रों द्वारा प्रमाणित इस सत्य की उपेक्षा भी नही की जा सकती कि यह अनादि है। अर्थात धर्म “शब्द” की उत्पत्ति इसके बाद में हुई है।अतः सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक ऊर्जा स्रोत की सत्य पहचान भूल चुके लोगों को, पुनः याद दिलाना व जोड़ना हमारा धर्म भी है और कर्तव्य भी।इसके अतिरिक्त भिन्न भिन्न मत, संप्रदाय में विभक्त होने के बावजूद भी, पूर्व जन्मों के संस्कारों के कारण, ॐ के प्रति श्रद्धा हम *सभी में एक मिलन बिंदु की संभावना* की तरह है। ॐ के जप के सुप्रभावों को शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक, आर्थिक उत्थान के स्तरों पर विज्ञान भी अनेको बार प्रमाणित कर चुका है।जो कुछ चंद लोग इससे भटक गए हैं वह निश्चित ही दया के पात्र हैं।भारतीय ध्वज में उपस्थित केसरिया रंग ऊर्जा का प्रतीक, सफेद शांति का प्रतीक, हरा संपन्नता और खुशहाली का प्रतीक है, और ॐ के जैसा ऊर्जा, शांति व सम्पन्नता प्राप्ति का श्रेष्ठतम साधन दूसरा कोई नहीं है। क्योंकि वैज्ञानिक हैंस जैनी ने टोनोस्कोप नामक यंत्र, जोकि ध्वनि आकृति देखने के लिए प्रयोग किया जाता है, से देखा तो जाना ॐ की ध्वनि आकृति श्री यंत्र की तरह होती है। जो कि, खुशहाली व संपन्नता के लिए सबसे अधिक स्थापित किया जाता है व उसकी साधना की जाती है।
यह चिंतित करने वाला है कि आज हम सब खंड-खंड हो गए हैं औऱ हमें अखंड भारत की परिकल्पना को साकार करना है तो इसके लिये विखंडन के इन कारणों को समझेंगे तो पायेंगे कि ॐ एक सर्वोत्तम समाधान है ।ॐ तीन अक्षर अ-उ-म से मिलकर बना है। जो कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश के प्रतीक हैं। ब्रह्मा जी के उपासक कम मनुष्य ही बने। विष्णु व महेश के उपासक अधिक संख्या में होने के बावजूद बंटते चले गए। विष्णु जी के उपासक वैष्णव हो गए और शिवजी के शैव। फिर इनके अवतारों के अनुसार ,मत ,मठ, पंथ, संप्रदाय, संस्थाओं रूपी शाखाओं में बंटते चले गए। और साथ ही साथ मूल स्रोत ॐ से साधना पद्धतियां भी दूर होती चली गई। यही आध्यात्मिक ऊर्जा के मूल स्रोत ॐ से दूरी समाज में विभिन्न प्रकार की समस्याओं का परम मूल कारण है। इस प्रकार इन अवतारों की संताने, उनके अवतार और उतनी ही शाखाएं और उतनी ही मत भिन्नताएं समाज के सामने खड़ी हो गई। काल के प्रभाव में भिन्न भिन्न आध्यात्मिक गुरु विभिन्न विभिन्न संस्थाएं धीरे धीरे पंथ में विभक्त होते हुए कब जाति और धर्म कहलाने लगे पता ही नहीं लगा। इतनी अधिक साधना शाखाएं हो गई कि लोग शाखाओं को सींचते सींचते जड़ ॐ साधना को ही भूल गए और जो सर्वश्रेष्ठ है, उत्पत्ति, संपन्नता, समृद्धि, शांति, खुशहाली का सहज साधन है, उससे ऊर्जा लेना ही बंद कर दिया। और मानवता कोतूहल विषमता व विनाश का शिकार हो गई। कुछ लोगों ने तो शैतानी व राजनैतिक दर्शन से प्रभावित होकर इसे इतना अधिक भुला दिया कि इस आध्यात्मिक सर्वश्रेष्ठ साधन को धार्मिक प्रतीक बताकर हमें आपस में बाँटना शुरू कर दिया।इस प्रकार इन सभी कारणों ने आपके व हमारे लिए मानव जाति को इस महान स्रोत की ओर पुनः उन्मुख करने व जोड़ने का पूण्य अवसर व अवकाश प्रदान कर दिया।अतः अंधकार को कबतक कोसेंगे…नवदीप जलाना ही होगा… को अपनी अलौकिक व अदभुत निर्णय क्षमता से चरितार्थ करने की कृपा करें।व इस संदर्भ में चर्चा हेतु योगीज सेना के प्रतिनिधि मंडल को मिलने का समय देने की कृपा करें। अग्रिम शुभकामनाओं सहित धन्यवाद।

शुभेच्छु
योग गुरु डॉ संजीव कुमार (राष्ट्रीय अध्यक्ष)
एवं समस्त योगीज सेना (9719339320)

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